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जानें क्या है 'लाट साहब' जुलूस की परंपरा Photograph: (File)
होली का त्योहार नजर की है. देशभर में इस बार 4 मार्च को होला का त्योहार मनाया जाएगा. जिसके लिए तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं. जहां बरसाना में लठमार होली खेली जाएगी तो वहीं बरसाना में लड्डू होली का आयोजन होगा. जबकि देश के अलग-अलग इलाकों में होली खेलने और त्योहार को मनाने की अलग-अलग परंपरा है. इन्हीं में से है 'लाट साहब' जुलूस की परंपरा. जो उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में होली के अवसर पर निकाला जाता है. जिसके लिए तैयारियां चल रही हैं.
तिरपाल से ढकी गईं 92 92 मस्जिदें और मजार
बता दें कि होली के अवसर पर शाहजहांपुर में निकलने वाले लाट साहब के जुलूस की तैयारियां जोरों पर हैं. प्रशासन भी जुलूस के लिए विशेष तैयारियां कर रहा है. जिसके लिए प्रशासन ने जुलूस मार्ग में पड़ने वाली कुल 92 मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया है. जिससे जुलूस के दौरान मस्जिद या मजार पर रंग पड़ने पर किसी प्रकार का विवाद पैदा ना हो. यही नहीं प्रशासन जुलूस के दौरान संवेदनशील स्थानों पर पुलिस बल की भी तैनाती करेगा. और पूरे आयोजन की निगरानी ड्रोन कैमरों से की जाएगी.
जुलूस के दौरान बॉडी कैमरा लगाकर चलेंगे पुलिसकर्मी
लाट साहब के जुलूस के दौरान इस बार सुरक्षा के खास इंतजाम किए जा रहे हैं. प्रशासन ने सुरक्षा की व्यापक तैयारियां की हैं. इस बार जुलूस के दौरान पुलिसकर्मी बॉडी कैमरा लगाकर चलेंगे. जिससे पूरे आयोजन के दौरान लाइव फुटेज रिकॉर्ड की जा सकें. प्रशासन के मुताबिक, इसका मकसद पारदर्शिता बनाए रखना और किसी भी अप्रिय घटना को तुरंत रोकना है. यही नहीं जुलूस के दौरान फायर ब्रिगेड की गाड़ियां भी साथ में रहेंगी. जिससे किसी भी आपातकालीन स्थिति में हालातों पर काबू पाया जा सके.
जानें क्या है लाट साहब के जुलूस की परंपरा
बता दें कि होली के मौके पर हर साल शाहजहांपुर में लाट साहब का जुलूस निकाला जाता है. जो अपने आप में अनोखी परंपरा है. जो कई दशक से चली आ रही है. लाट साहब के जुलूस वाली होली को जूता मार होली के नाम से जाना जाता है. क्योंकि इस परंपरा के मुताबिक, शहर में बड़े लाट साहब और छोटे लाट साहब के प्रमुख जुलूस निकाले जाते हैं. जुलूस के दौरान एक व्यक्ति को अंग्रेजों के प्रतीक यानी 'लाट साहब' के रूप में भैंसा गाड़ी पर बैठाया जाता है और उसे जूते और झाड़ू से प्रतीकात्मक रूप से पीटा जाता है. ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा अंग्रेजों के प्रति ऐतिहासिक आक्रोश को दिखाने के लिए शुरू की गई थी.
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