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BMC Election 2026: महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन कोई नई बात नहीं है, लेकिन अकोला जिले की अकोट नगर परिषद में जो हुआ, उसने सियासी समझ को उलट-पुलट कर रख दिया है. जिन दलों को राष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे का कट्टर विरोधी माना जाता है, वे स्थानीय सत्ता के लिए एक ही मंच पर खड़े नजर आ रहे हैं. बीजेपी और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का साथ आना इस प्रयोग को सबसे ज्यादा चौंकाने वाला बनाता है.
त्रिशंकु जनादेश से निकला ‘विकास मंच’
अकोट नगर परिषद की कुल 35 सीटों में से 33 पर चुनाव हुए, लेकिन किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. बीजेपी 11 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी जरूर बनी, पर सत्ता बनाने के लिए जरूरी आंकड़ा उससे दूर था. इसी राजनीतिक खालीपन में जन्म हुआ ‘अकोट विकास मंच’ का एक ऐसा गठबंधन, जहां विचारधाराएं पीछे छूट गईं और सत्ता की गणित सबसे आगे आ गई.
बीजेपी की माया धुले ने नगराध्यक्ष पद हासिल किया और इसके बाद इस मंच को औपचारिक रूप से अकोला जिला प्रशासन के पास पंजीकृत कराया गया. यहीं से यह गठबंधन सिर्फ राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि एक संस्थागत शक्ति बन गया.
विरोधियों की थाली में परोसा गया सत्ता का कॉकटेल
इस मंच की सबसे बड़ी खासियत इसकी विविधता है. बीजेपी के साथ AIMIM की पांच सीटें जुड़ीं, वहीं प्रहार जनशक्ति पक्ष, दोनों शिवसेना गुट और एनसीपी के दोनों धड़े भी इसी छत के नीचे आ गए. कुल मिलाकर यह गठबंधन बहुमत के आंकड़े को आराम से पार कर गया.
यह वही AIMIM है, जिस पर बीजेपी अक्सर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाती है. वहीं शिवसेना के शिंदे और उद्धव गुट, जो राज्य की राजनीति में आमने-सामने हैं, अकोट में एक ही बेंच पर बैठे दिखे. एनसीपी में चाचा-भतीजे की जंग भी यहां फिलहाल विराम पर है.
CM फडणवीस ने किया खारिज
उधर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस गठबंधन को खारिज कर दिया है. यही नहीं उन्होंने पार्टी नेताओं को भी चेतावनी दी है कि इस तरह का कोई भी गठबंधन स्वीकार नहीं किया जाएगा. मुख्यमंत्री फडणवीस ने साफ किया है कि इस गठबंधन को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मंजूरी नहीं मिली है. इस तरह के अलायंस को अनुशासन का उल्लंघन भी माना जाएगा.
जब ‘विकास’ बना सबसे बड़ा नारा
इस पूरे समीकरण में सबसे अहम शब्द है विकास. नेताओं का दावा है कि स्थानीय स्तर पर शहर के विकास के लिए वैचारिक मतभेदों को दरकिनार किया गया है. अकोट में यह तर्क दिया जा रहा है कि नगर परिषद राष्ट्रीय राजनीति का अखाड़ा नहीं, बल्कि नागरिक सुविधाओं का मंच है.
कमजोर हुआ विपक्ष, मजबूत हुई चर्चा
इतने बड़े गठबंधन के बाद विपक्ष लगभग सिमट गया है. कांग्रेस और वंचित बहुजन अघाड़ी ही अब विपक्ष की भूमिका में हैं. संख्या भले कम हो, लेकिन सवाल उठाने की जिम्मेदारी अब इन्हीं पर है.
अकोट का संदेश
अकोट की राजनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते. यहां हालात तय करते हैं कि कौन किसके साथ खड़ा होगा. सवाल सिर्फ इतना है क्या यह प्रयोग विकास की नई कहानी लिखेगा, या इसे सिर्फ सत्ता की सुविधा वाला गठबंधन माना जाएगा?
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