Gurugram Police के खौफ से बंगालियों का पलायन, शहर छोड़ गए हज़ारों प्रवासी बंगाली भागे

Gurugram: स्थानीय पुलिस और इंटेलिजेंस यूनिट उन्हें बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में ले जाती है. कई बार बिना किसी नोटिस या पहचान पूछे ही सिविल ड्रेस में लोग आकर उन्हें उठा ले जाते हैं.

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Yashodhan Sharma
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Gurugram: स्थानीय पुलिस और इंटेलिजेंस यूनिट उन्हें बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में ले जाती है. कई बार बिना किसी नोटिस या पहचान पूछे ही सिविल ड्रेस में लोग आकर उन्हें उठा ले जाते हैं.

Gurugram: गुड़गांव के सेक्टर 49 स्थित बंगाली कॉलोनी में इन दिनों दहशत और असुरक्षा का माहौल है. यहां रहने वाले हजारों परिवारों में से अब केवल 200-250 परिवार ही बचे हैं, बाकी सभी अपना घर छोड़कर पलायन कर चुके हैं. कारण है – पुलिस का लगातार दबाव, बांग्ला भाषा बोलने वालों पर संदेह और पहचान पत्रों की जांच के नाम पर कथित प्रताड़ना.

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2007 से जमे हैं मजदूर

यह कॉलोनी वर्षों से पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों से आए मजदूरों और घरेलू कामगारों की बस्ती रही है. इनमें से अधिकतर लोग 2007 से गुड़गांव में मेहनत-मजदूरी कर अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं. उनके पास वोटर कार्ड, आधार कार्ड और पैन कार्ड जैसे सभी जरूरी दस्तावेज भी हैं. बावजूद इसके, स्थानीय पुलिस और इंटेलिजेंस यूनिट उन्हें बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में ले जाती है. कई बार बिना किसी नोटिस या पहचान पूछे ही सिविल ड्रेस में लोग आकर उन्हें उठा ले जाते हैं.

ये है स्थानीय लोगों का आरोप

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार थानों में पीटा भी गया और डराया-धमकाया गया. एक महिला ने बताया कि उसका बच्चा सातवीं कक्षा में पढ़ता था, लेकिन डर के कारण उसे गांव भेजना पड़ा. वहीं एक अन्य बुजुर्ग ने बताया कि वह 20 साल से यहां कुक का काम कर रही हैं, लेकिन अब डर है कि कभी भी जबरन हटा दिया जाएगा.

इस स्थिति से केवल प्रभावित परिवार ही नहीं, बल्कि स्थानीय रेजिडेंट्स भी परेशान हैं. रिटायर्ड परिवारों ने कहा कि अगर ये लोग चले गए तो घरेलू कामकाज, कुकिंग, सफाई जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भारी परेशानी होगी. कुछ ने तो इसे कोविड जैसी स्थिति की वापसी बताया, जब सारी जिम्मेदारी खुद करनी पड़ी थी.

उठ रहे गंभीर सवाल

बंगाली कॉलोनी के निवासियों का एक ही सवाल है कि अगर हम भारतीय हैं, हमारे पास सभी प्रमाण हैं, तो केवल भाषा के आधार पर हमें क्यों सताया जा रहा है? यह मामला अब केवल एक बस्ती का नहीं, बल्कि एक बड़े सवाल का है – क्या भारत में भाषा के आधार पर नागरिकता की पहचान तय की जाएगी?

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