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Nirbhaya Case:7 साल से निर्भया के गुनाहगार देश के सब्र का ले रहे इम्तिहान- SG तुषार मेहता

फांसी की सजा टालने के पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की अर्जी पर दिल्ली हाईकोर्ट रविवार के दिन विशेष सुनवाई कर रहा है.

Arvind Singh | Edited By : Deepak Pandey | Updated on: 03 Feb 2020, 06:08:24 AM
निर्भया के दोषी

निर्भया के दोषी (Photo Credit: फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली:

निर्भया के दोषियों की फांसी की सजा टालने के पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की अर्जी पर दिल्ली हाईकोर्ट रविवार के दिन विशेष सुनवाई कर रहा है. सरकार ने कोर्ट में कहा कि सभी दोषियों की फांसी की सजा एक साथ देना जरूरी नहीं है. सभी के कानूनी राहत के विकल्प खत्म होने का इतंजार करने की जरूरत नहीं है. दोषियों को अलग-अलग भी फांसी दी जा सकती है.

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केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता सरकार का पक्ष रख रहे हैं. तुषार मेहता ने कोर्ट को सभी दोषियों की कानूनी राहत के स्टेटस का चार्ट सौंपा. SG अब कोर्ट को सभी दोषियों की याचिका के स्टेटस की जानकारी दे रहे है. उन्होंने कोर्ट में कहा कि दोषियों के रवैये से साफ है कि वो कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. SG ने अलग-अलग दोषियों का हवाला देकर बताया कि कैसे वह एक-एक करके याचिका दायर कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले आने के बाद रिव्यू ,क्यूरेटिव फाइल करने में देरी हुई, ताकि मामले को लटकाया जा सके.

SG तुषार मेहता अब जेल नियम और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि इन्होंने एक लड़की के साथ रेप किया. उसके शरीर में रॉड डाली और फिर उसे मरने के लिए सड़क पर फेंक दिया, लेकिन जानबूझकर दोषी आपस में मिलकर कानून के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. पवन ने जानबूझकर अभी तक क्यूरेटिव और दया याचिका दाखिल नहीं की है.

SG ने कहा कि नियमों के मुताबिक किसी दोषी को फांसी केवल तब नहीं हो सकती जब SLP सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर एक अपराध में कई गुनाहगार हैं तो फांसी की सजा पर अमल तब नहीं हो सकेगा जब तक सभी दोषियों की SLP का SC से निपटारा हो जाए, लेकिन दया याचिका के स्टेज पर ऐसा नहीं है. दया याचिका के स्टेज पर सबको एक साथ ही फांसी की सजा देने की बाध्यता नहीं है. अलग-अलग फांसी हो सकती है.

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दिल्ली हाई कोर्ट में एसजी तुषार मेहता नियमों का हवाला देकर ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि जिनकी दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज कर दी है, उन्हें फांसी दी जा सकती है. सभी दोषियों के विकल्प खत्म होने का इतंजार करने की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा, दया याचिका के स्टेज पर स्थिती अलग हो जाती है. राष्ट्रपति किसी की दया अर्जी खारिज कर सकते हैं. किसी की सजा को माफ कर सकते हैं. ये हर केस में उनके विवेक पर निर्भर है तो फिर सभी दोषियों की दया याचिका निपटारा करने तक का इतंजार का कोई मतलब नहीं है.

तुषार मेहता ने आगे कहा कि 1982 के हरबंस सिंह का केस अलग था. वो मामला सुप्रीम कोर्ट में SLP के स्टेज पर था, लेकिन यहां स्थिति अलग है. यहां तो SLP के बाद रिव्यू और क्यूरेटिव खारिज हो चुकी है. 1982 के हरबंस सिंह केस का निचली अदालत में दोषियों के वकील ने हवाला देते हुए कहा था कि एक गुनाह के दोषियों को अलग-अलग फांसी नहीं हो सकती है, लेकिन यहां SG ये साबित कर रहे हैं कि वहां हालात अलग थे. वहां का स्टेज तब का था जब एक दोषी की SLP (special leave petition) SC में बाकी थी.

आपको बता दें कि यहां SLP (special leave petition) से आशय उस अर्जी से है जब दोषियों की ओर से सजा की पुष्टि वाले हाईकोर्ट के फैसले को SC में चुनौती दी गई थी.

तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले में दोषियों के कृत्य पाशविक था. उन्होंने बर्बरता की सारी हदों का पार कर दिया. उनके जघन्य अपराध ने सामाजिक चेतना को झकझोर दिया. आज वो दोषी कानून के साथ खिलवाड़ कर देश के सब्र की परीक्षा ले रहे हैं. न्यायपालिका की साख, उसमें लोगों का विश्वास दांव पर लगा है कि कोर्ट फांसी के फैसले पर अमल नहीं करवा पा रहा है. लोग न्यायपालिका में विश्वास खो रहे हैं. इसी वजह से तेलंगाना एनकाउंटर के बाद लोगों ने जश्न मनाया. सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता की दलील पूरी हो गई है.

अब दोषियों के वकील एपी सिंह कोर्ट में अपनी दलीलें रख रहे हैं. वकील एपी सिंह ने कहा- अक्षय की दया याचिका अभी पेंडिंग है, जबकि विनय की ओर से अभी क्यूरेटिव याचिका और दया याचिका दायर करने का विकल्प अभी बचा है. निचली अदालत ने सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक सभी को धैर्यपूर्वक सुना और फिर तय किया ( फांसी की सज़ा पर रोक लगाई). एपी सिंह ने कहा कि 2014 केव शतुघ्न चौहान केस में दी व्यवस्था का हवाला दे रहे हैं, जिसके मुताबिक दया याचिका खारिज होने के बाद भी कम से कम 14 दिनों की मोहलत मिलनी चाहिए.

दोषियों के एडवोकेट एसपी सिंह कहा कि SG ने जेल नियमों की अलग ही व्याख्या दी है. हम इस व्याख्या से संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने कहा कि दोषी रूरल बैकग्राउंड से हैं, पिछड़े समाज से आते हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में याचिका दायर करने के लिए स्पष्ट तौर पर कोई समयसीमा का जिक्र नहीं है तो इसमें कसूर दोषियों का तो नहीं है.

वकील एपी सिंह ने कहा कि तिहाड़ जेल के अधिकारी की किताब ब्लैक वारंट में खुद माना है कि कैसे पूरी प्रकिया का उल्लंघन किया गया. TIP के वक्त पुलिस अधिकारी मौजूद रहे. SG ने विरोध किया. कहा- ये सब बातें SC में कह चुके हैं. उन्होंने रामसिंह की जेल में मौत का हवाला दिया तो जज ने उन्हें टोका. कोर्ट ने कहा- यहां सारी बातें उठाने का क्या औचित्य है?. रामसिंह की मौत हो चुकी है. उसका केस हमारे सामने नहीं है. ये ट्रायल की स्टेज नहीं है. ऐसे ही बेवजह की दलीलों की इजाजत नहीं दी जा सकती है.

वकील एपी सिंह ने कहा कि कुछ और बातें उठानी चाहिए. मसलन एक गवाह की बयान की विश्वसनियता पर सवाल उठाए, लेकिन जज ने उन्हें रोक दिया. उनकी दलील पूरी हो गई है. अब दोषी मुकेश की ओर से रेबेका जॉन दलीलें रख रही है.

दोषी मुकेश की ओर से रेबेका जॉन ने कोर्ट में कहा कि 14 जनवरी को मुकेश की क्यूरेटिव पिटीशन खारिज हुई. उसके तुंरत बाद उसी दिन दया याचिका भी दायर कर दी गई. रेबेका जॉन ने कोर्ट के सामने अपने मुवक्किल की याचिका से जुड़ी टाइम लाइन रखा. कहा- जब निचली अदालत से जारी डेथ वारंट के खिलाफ हमने हाई कोर्ट का रुख किया था तो HC ने  कोई दखल देने से इन्कार करते हुए हमें कोई राहत नहीं दी थी. हमें ट्रायल कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए कहा गया था तो फिर अब सरकार कैसे ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट आ सकती है.

वकील रेबेका जॉन ने कहा कि चाहे अपराध कितना भी जघन्य हो, दोषियों को समाज कितनी भी नफरत की नजर से देखता हो, लेकिन उनके भी कानूनी अधिकार है. आखिरी सांस तक उन्हें पैरवी का अधिकार है. इस लिहाज से मैं उनकी पैरवी कर रही हूं. आप मेरी बात से सहमत हो या ना हो. ये आप पर निर्भर है. उन्होंने आगे कहा कि सरकार अचानक से कल ही क्यों जागी. उससे पहले वो कहां थे. क्यों ट्रायल कोर्ट में पहले डेथ वारंट जारी करवाने के लिए सरकार की ओर से अर्जी दायर नहीं की गई. दोषी तो अंतिम सांस तक अपनी कानूनी राहत के विकल्पों के सहारा लेते रहेंगे ही.

रेबेका जॉन ने आगे कहा- सभी दोषियों की फांसी एक ही कॉमन आदेश के जरिये हुई है. फिर फांसी अलग-अलग कैसे हो सकती है. जेल नियमों में कोई प्रावधान नहीं है, जिसके जरिये अलग-अलग फांसी दी जा सकती है. एक गुनाह में शामिल दोषियों को एक ही साथ फांसी की सजा हो सकती है. उन्होंने कहा कि फांसी की सजा पाए दोषियों के भी अपने अधिकार हैं. आखिर इतनी जल्दी क्यों है. अगर ये मान भी लिया जाए कि मेरा अपराध सबसे ज़्यादा  घिनौना है, तब भी मुझे आर्टिकल 21 के तहत मिले मूल अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है.

रेबेका जॉन ने कहा कि अगर ये मान लिया जाए कि अगर राष्ट्रपति ने किसी एक दोषी की दया याचिका स्वीकार कर ली तो ये कहना कि मेरी दया याचिका पहले से ही खारिज होने के चलते मेरे केस में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, ऐसा कहना सही नहीं होगा. अगर चाहे तो दूसरी बार दया याचिका दाखिल करने का विकल्प बचता है, लेकिन ये अधिकार सुरक्षित ही नहीं रहेगा अगर मुझे पहले फांसी हो गई हो.

इसके बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि रेबेका जॉन की दलीलों का जवाब देने के लिए वह 5 मिनट और चाहते हैं. SG ने कहा कि आगे चलकर राष्ट्रपति क्या फैसला लेंगे, इसका कयास लगाकर फांसी एक साथ ही होने की दलील देना सही नहीं है. कहा- केन्द्र सरकार क्या कर रही थी, ये दलील बेतुकी. क्या हम ये कह सकते हैं कि कोर्ट क्या कर रहा था. हो सकता है कि दिल्ली सरकार ने देरी की हो पर हमारा सवाल उठाना सही नहीं है.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति दो दोषियों की दया याचिका खारिज कर चुके हैं. मान लीजिए कि तब क्या होगा कि पवन क्यूरेटिव या दया याचिका दाखिल ही न करे. शत्रुघ्न चौहान केस में दी गई गाइड लाइन को लेकर SC में पेंडिंग अर्जी का इस केस से कोई वास्ता नहीं है. SG ने कहा- लोग अपनी लड़कियों को सड़क पर घूमने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि सड़कों पर दरिंदे घूम रहे हैं. ऐसी कोई बाध्यता नियमों के मुताबिक नहीं है कि दोषियों की फांसी की सज़ा एक साथ ही होनी है.

कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखने को कहा, लेकिन SG अभी भी दलीलें रख रहे हैं. SG ने ये दलील निर्भया जैसे मामले में इंसाफ में देरी होने के संदर्भ में कही. इस तरह सभी वकीलों की दलीलें पूरी हो गई है. इसके बाद दिल्ली HC ने फैसला सुरक्षित रखा.

First Published : 02 Feb 2020, 03:47:53 PM

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