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सांकेतिक तस्वीर Photograph: (Meta AI Freepik)
Delhi University: दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में स्थित स्मार्ट मटेरियल एंड डिवाइसेस लैब (SMDL) में भारतीय सशस्त्र बलों के जवानों के लिए एक क्रांतिकारी बायोलॉजिकल सेंसर तकनीक विकसित की जा रही है, जो सब-जीरो तापमान में तैनात सैनिकों को हार्ट अटैक से पहले अलर्ट दे सकेगी.
कैसे काम करेगा सेंसर
विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक ठंडे इलाकों, खासकर हिमालयी क्षेत्रों में तैनात जवानों के शरीर में खून गाढ़ा होने (ब्लड थिकनिंग) और ब्लड क्लॉटिंग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जिससे हार्ट अटैक की आशंका भी बढ़ती है. SMDL में विकसित यह सेंसर शरीर के अंदर होने वाले सूक्ष्म बदलावों और खास बायोमार्कर्स के माध्यम ररतकेोितकेोरिोेतरिेोतकिरोेिेोिेिसे खतरे की पहचान करेगा.
हिमालयी क्षेत्रों में पहुंचाए गए शुरुआती डिवाइस
लैब से विकसित कुछ डिवाइस भारतीय सशस्त्र बलों तक हिमालयी क्षेत्रों में भेजे जा चुके हैं, जो जल्द ही फील्ड में काम करना शुरू करेंगे. यह डिवाइस खून में मौजूद प्लाज्मा के विश्लेषण के जरिए यह अनुमान लगाने में सक्षम है कि किसी सैनिक को दिल का दौरा पड़ने का खतरा कितनी जल्दी हो सकता है. समय रहते अलर्ट मिलने पर जवान को बेस कैंप या मिलिट्री हॉस्पिटल पहुंचाकर उसकी जान बचाई जा सकेगी.
सैनिकों के लिए क्यों है यह तकनीक अहम
अत्यधिक ठंड में शरीर की रक्त संचार प्रणाली प्रभावित होती है. SMDL की टीम के अनुसार यह बायोलॉजिकल सेंसर यह भी बताएगा कि किसी सैनिक के शरीर में ब्लड क्लॉटिंग का स्तर खतरनाक सीमा तक तो नहीं पहुंच रहा, जिससे समय रहते इलाज संभव होगा.
यह तकनीक सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं रहेगी
'आजकल आम लोगों में भी अचानक हार्ट अटैक के मामलों का एक बड़ा कारण ब्लड क्लॉटिंग है. भविष्य में यदि यह सेंसर आम लोगों तक पहुंचती है, तो बुजुर्गों, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल के मरीजों के लिए यह बेहद उपयोगी साबित होगी.'
पॉइंट ऑफ केयर डायग्नोसिस में नई उम्मीद इन बायो सेंसर्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें पॉइंट ऑफ केयर डायग्नोसिस के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. यानी अस्पताल की बड़ी मशीनों पर निर्भर हुए बिना मौके पर ही जांच संभव होगी. इन सेंसरों से ऑन-फील्ड टेस्टिंग की जा सकती है, जिससे मरीज या सैनिक को तुरंत स्थिति की जानकारी मिल सकेगी.
चिप से हैंडहेल्ड डिवाइस तक
रिसर्च स्कॉलर तान्या ने बताया कि SMDL में सेंसर की पूरी फैब्रिकेशन लैब के भीतर की जा रही है. माइक्रो-लेवल चिप से लेकर हैंडहेल्ड पोर्टेबल डिवाइस तक के प्रोटोटाइप तैयार किए जा चुके हैं, जिससे भविष्य में इनका इस्तेमाल आसान और व्यावहारिक होगा.
रिसर्च से बाजार तक पहुंचने में लगेगा समय कोई भी तकनीक सीधे बाजार में नहीं आती. पहले रिसर्च और डेवलपमेंट, फिर इंडस्ट्री कोलैबोरेशन और बड़े स्तर पर उत्पादन होता है. इस पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर 5 साल तक का समय लग सकता है. फिलहाल इस तकनीक के पेटेंट और इंडस्ट्री कोलैबोरेशन की प्रक्रिया चल रही है.
रिसर्च टीम
प्रो. मोनिका तोमर, मिरांडा हाउस
प्रो. मलिका वर्मा, एडवाइजर
डॉ. रीमा गुप्ता
डॉ. अंजलि शर्मा
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