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दिल्ली हाईकोर्ट ने सीएफओ नीतिका सूर्यवंशी केस में सेबी के डिस्क्लोजर नियमों की खामियों पर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने कहा कि कि वरिष्ठ अधिकारियों के पुराने आपराधिक, पेशेवर मामलों का निवेशकों को खुलासा अनिवार्य होना चाहिए।
वरिष्ठ कॉरपोरेट अधिकारियों की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने सेबी के डिस्क्लोजैर नियमों में संभावित ब्लाइंड स्पॉट पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यह टिप्पणी सीएफओ नीतिका सूर्यवंशी से जुड़े एक केस की सुनवाई से जुड़े एक मामले में आई है। यहां उनके कथित लंबित आपराधिक मामलों के गैर-प्रकटीकरण और कंपनी के शेयरों में असामान्य उतार-चढ़ाव पर एक याचिका दायर की गई थी। फ़िलहाल नीतिका सूर्यवंशी को आपराधिक मामलों में अभी बेल पर मंजूरी दी गई है।
कोर्ट ने सेबी को ट्रेडिंग पैटर्न, सीएफओ की भूमिका और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए कड़े डिस्क्लोजर मानकों पर विचार का आदेश दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला सिर्फ नियमों की समीक्षा नहीं, बल्कि सीएफओ नीतिका सूर्यवंशी की व्यक्तिगत साख और भारत में कॉरपोरेट गवर्नेंस मानकों के लिए परीक्षा बन सकता है।
क्या है मामला
2 जनवरी 2026 के आदेश में कोर्ट ने सेबी से पूछा कि क्या मौजूदा नियम वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पूर्व कानूनी या पेशेवर इतिहास को निवेशकों से छुपाने की छूट देते हैं। अदालत ने साफ कहा कि ऐसा होना निवेशक संरक्षण की मूल भावना के खिलाफ माना गया है।
याचिका के तहत 2019 से 2025 के बीच सीएफओ नीतिका सूर्यवंशी के कार्यकाल के दौरान कंपनी के शेयरों में 20 रुपए से 375 रुपए तक का तेज़ी पाई गई। असामान्य उतार-चढ़ाव देखा गया और पुनर्नियुक्ति के बाद 80-88 रुपए तक गिरावट। हालांकि अदालत ने बाज़ार हेरफेर का सीधा आरोप नहीं लगाया, लेकिन इस पैटर्न को चिंताजनक बताया।
कोर्ट को बताया गया कि सीएफओ नीतिका सूर्यवंशी के खिलाफ आईपीसी के तहत आपराधिक केस और आईसीएआई में पेशेवर शिकायतें लंबित हैं। इनका कथित रूप से न तो नियुक्ति के वक्त न ही बाद में निवेशकों को खुलासा किया गया।
नियमों पर उठे सवाल
हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि सेबी (एलओडीआर) नियमों में केवल वर्तमान कार्यकाल के मामलों के प्रकटीकरण की बाध्यता एक गंभीर नियामकीय कमी को बताया। अदालत ने कहा, 'निवेशक संरक्षण को तकनीकी खामियों की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।'
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