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यूपी में दबदबा कायम करने की राह पर महिलाएं, 46% मातृशक्ति के हाथ में राजतिलक की थाली

2007 में महिलाओं का टर्न आउट पुरुषों की तुलना में 7.43% कम था। 2012 आते-आते यह सिनेरियो बदल गया। 2017 में हर रिकॉर्ड टूट गए, यूपी में पहली बार महिलाओं ने बंपर वोटिंग की।

Aditya Singh / Purnendu Shukla | Edited By : Pradeep Singh | Updated on: 21 Dec 2021, 07:54:01 PM
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यूपी में महिलाएं (Photo Credit: News Nation)

highlights

  • यूपी में महिला वोट 46%, 30% से 40% मिल जाए तो जीत लगभग तय
  • पिछले कुछ सालों में महिलाएं एक अलग वोट बैंक के तौर पर उभरी हैं
  • पार्टियों की नजर महिला वोट बैंक पर, पिछली बार बीजेपी को मिला था इनका साथ

नई दिल्ली:  

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में महिलाओं से जुड़े एक कार्यक्रम को संबोधित किया। प्रधानमंत्री ने इस दौरान दीनदयाल अंत्योदय योजना की सबस्कीम नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन के तहत, 1 लाख 40 हजार स्वयं सहायता समूहों को 1 हजार करोड़ की साहयता राशि दी। इससे प्रदेश की 16 लाख महिलाओं को लाभ मिलेगा। प्रधानमंत्री ने 20 हजार बिजनेस कोरस्पोंडेंट सखियों (बीसी सखी) के खाते में चार-चार हजार रुपए डाले। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने योगी सरकार की योजना ‘मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना’ के तहत, 1 लाख लाभार्थियों के खाते में 20 करोड़ से ज्यादा की रकम ट्रांसफर की। क्या इसके राजनीतिक मायने भी हैं?

2017 के चुनावों से समझिए 46% की ताकत

दरअसल, उत्तरप्रदेश 2022 के चुनावी दहलीज पर खड़ा है। बस चंद महीनों में यूपी नई सरकार चुन लेगा। ऐसे में योजनाओं के तहत लाभ, नई योजनाएं और वादों की बाढ़ सी आ जाए, तो दांतों तले उंगली दबाने के बजाए उसे राजनितिक कसौटी पर कसा जाना चाहिए। यूपी के चुनावों में महिलाओं की भूमिका अहम हो चली है। ऐसे में सभी राजनितिक पार्टियां महिलाओं को कन्वेंस करने की कोशिश में जुट गई हैं। 

इसी कड़ी में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने ऐलान किया था कि उनकी पार्टी से 40% टिकट महिलाओं को दिया जाएगा। क्या है इसकी वजह? दरअसल उस दौर में जब बीजेपी और सपा छोटे दलों से गठबंधन में लगी हैं, तब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी महिलाओं को मोबलाइज करने की कोशिश कर रही हैं, इसकी एक बड़ी वजह यह कि सपा और बसपा की तरह कांग्रेस का कोई बेस नहीं है।

कांग्रेस ने पिंक मेनिफेस्टो जारी किया है, जिसे 6 सेगमेंट में बांटा गया है। इसमें आत्मसम्मान, गरिमा, आत्मनिर्भरता, शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य शामिल है। इससे पहले भी प्रियंका गांधी 12वीं की छात्राओं को एक स्कूटर और एक मोबाइल फोन देने का वादा कर चुकी हैं। इसके अलावा आशा वर्करों को 10 हजार रुपए भत्ता देने का वादा भी प्रियंका गांधी कर चुकी हैं। न केवल कांग्रेस-भाजपा बल्कि दूसरी पार्टियां भी महिलाओं को अपने पाले में लाने की हर कोशिश कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में महिलाओं की क्या भूमिका हो सकती है? पिछले 7-8 सालों में राजनीतिक डिस्कोर्स में महिलाएं प्राइम स्टेक होल्डर के तौर पर स्थापित हुई हैं। ऐसा पहले भी होता रहा है कि महिला वोटरों को अलग-अलग तरीके से सभी पार्टियों ने अपने तरफ खींचने की कोशिश की है, लेकिन हाल के सालों में महिला वोटरों की अहमियत राजनितिक पार्टियों के लिए और भी बढ़ गई है।

2017 के इलेक्टोरल डेटा के मुताबिक यूपी में महिला वोटर 46% हैं। 46% मतलब 6.4613 करोड़, इसमें से अगर 40% वोट किसी पार्टी को मिल जाए, तो यूपी में उसकी जीत लगभग तय हो जाती है। 40% महिला वोट मिलना मतलब टोटल का 18% मिलना। 18% बड़ा चंक  होता है, कितना बड़ा हम बताते हैं। 2017 से पहले के तीन चुनावों पर नजर डाला जाए तो ये पता चलता है कि जिस पार्टी को लगभग 25.5% से 30% तक वोट मिल जाता है उसकी सरकार बन जाती है। अब आपको अंदाजा हो गया होगा कि 18% कितना बड़ा चंक है और महिला वोटर क्यों अहम है। 2017 में कुछ ऐसा ही करिश्मा हुआ था, तब बीजेपी को 41% महिलाओं ने वोट किया था। 

क्या महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा क्लियर हैं?

पिछले तीन चुनावों पर गौर करें तो हमें कुछ खास इनसाइट्स मिलते हैं। सरकार बनाने वाली पार्टियों को महिला वर्ग पुरुष वर्ग की तुलना में ज्यादा वोट कर रहा है, लेकिन पुरुषों और महिलाओं की तुलना करने पर पता चलता है कि दोनों के वोटिंग पैटर्न में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। तो खास क्या है, यह कि 2007 और 2012 में सरकार बनाने वाली पार्टी को महिलाओं से ज्यादा वोट तो मिला, लेकिन उसकी रेंज 31% से 32% तक ही रही, जबकि 2017 में बीजेपी का साथ, वोट देने निकलीं 41% महिलाओं ने दिया। 

गौर करने वाली बात यह यह कि 2017 में पुरुषों की तुलना में 4% ज्यादा महिला वर्ग की वोटर वोट करने निकली, उसमें से 41% महिलाओं ने बीजेपी को वोट किया। हम यह देख रहें हैं कि न सिर्फ महिलाओं का टर्न आउट बढ़ रहा है बल्कि साथ-साथ महिलाओं की क्लियार्टी भी बढ़ रही है कि वो किस पार्टी को चुनेंगी। यह वह फैक्टर है जो महिला वोटर को बल्क वोटर या इलेक्टोरल बेस के तौर पर स्थापित करता है। यही वजह है कि पॉलिटिकल डिस्कोर्स में उनकी अहमियत बढ़ी है। 

क्या बीजेपी को फिर मिलेगा महिलाओं का साथ?

इसे समझने के लिए हम केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं को समझने का प्रयास करेंगे। ये समझना जरूरी है कि बीजेपी सरकार की योजनाओं की महिलाओं तक पहुंचने का स्वरूप क्या है? क्या इन योजनाओं से लाभ पाने वाली महिलाएं बीजेपी की वोटर साबित हो सकती हैं? अगर लाभ पाने वाली महिला बीजेपी के लिए वोटर की भूमिका निभा देतो बीजेपी को क्या लाभ होगा?

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना

कोरोना के दौरान 26 मार्च 2020 को वित्त मंत्री निर्मला सीतरमण ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (PMGKY) के तहत, 1.7 लाख करोड़ का राहत पैकेज जारी किया। वित्त मंत्रालय ने ऐलान किया कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत, 20.4 करोड़ महिला जनधन खाते धारकों के खाते में अगले 3 महीने तक 500 रुपए डाले जाएंगे। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक अकेले उत्तरप्रदेश में 3.18 करोड़ जनधन महिला खातेधारकों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का फायदा मिला।

उत्तर प्रदेश में लगभग 46% महिला वोटर हैं, उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में कुल 4.0905 करोड़ महिला वोटरों ने वोट किया था। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना से लाभ पाईं महिआलों की संख्या 3 करोड़ 18 लाख है, जो 2017 में वोट करने वाली कुल महिलाओं का 77.7%  है।  2017 के इलेक्टोरल डेटा के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल महिला वोटर 6.4613 करोड़ है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना से लाभ पाने वाली महिलाओं की संख्या कुल महिला वोटरों की 49.2% है। यानी कुल महिला वोटरों में से लगभग आधी महिलाओं तक, मोदी की योजना सीधे पहुंची। जो कुल (मेल+फीमेल+थर्ड जेंडर) वोटरों का लगभग 22.5% बैठता  है। यानी मोदी की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ यूपी 22.5% वोटरों तक पहले ही पहुंच चुकी है।

आप कह सकते हैं कि इस 22.5% वोट में से सारा का सारा बीजेपी को मिले यह जरूरी नहीं, तो चलिए हम कम से कम वाली संभावनाओं पर भी नजर डाल लेते हैं। 22.5% वोट मतलब 3 करोड़ 18 लाख वोट। पिछली बार महिला टर्नआउट 63% था, तो हम यह मान कर चलते हैं कि सिर्फ इनमें से सिर्फ 63% महिलाएं ही वोट डालने निकलेंगी। 3 करोड़ 18 लाख वोट का 63% निकालें, तो होता है 2 करोड़ 34 हजार। यानी जिन 3 करोड़ 18 लाख महिलाओं को कोरोना में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ मिला, उसमें से 2 करोड़ 34 हजार महिला वोटर वोट के लिए निकलेंगी।  CSDS का सर्वे कहता है कि 2017 में जितनी महिला वोटिंग के लिए निकलीं, उसमें से 41% महिआलों ने बीजेपी के लिए वोट किया। हम यह मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना से लाभ पाने वाली महिलाओं में से, जो 2 करोड़ 34 हजार महिला वोटर वोट के लिए निकलेंगी, उसमें से 41% महिला वोटर बीजेपी को वोट देंगी। 2 करोड़ 34 हजार का 41% होता है, 82 लाख 13 हजार 180, जो यूपी में कुल महिला वोट का लगभग 12.71% है और कुल वोट (मेल+फीमेल+थर्ड जेंडर) का लगभग 5.79% है। इस प्रोजेक्शन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अकेले PMGKY के चलते आने वाले चुनावों में, बीजेपी को लगभग 6% से 22% वोटों का लाभ हो सकता है। 

उज्ज्वला योजना

उत्तर प्रदेश में कुल 3.7613 करोड़ एलपीजी कनेक्शन हैं। इनमें से लगभग 35% यानी 1.3148 करोड़ गैस कनेक्शन 2016 से 2019 के बीच, उज्ज्वला योजना के तहत दिए गए हैं। जाहिर है ये सारे कनेक्शन महिलाओं के नाम हैं। अब इन कनेक्शन की तुलना उत्तर प्रदेश के 2017 के चुनावों में पोल हुए कुल महिला वोटों से करते हैं। ऐसा करने से हमें पता चलता है कि जितनी महिलाओं ने वोट किया उसमें से 32.14% महिला वोटरों तक, मोदी की ये योजना पहुंच चुकी है। कुल महिला वोटरों के लिहाज से देखें तो 20.3% योजनाओं तक मोदी की उज्जवला योजना पहुंच चुकी है। कुल वोटरों के तुलना में देखें तो मोदी की उज्जवला योजना 9.28% वोटरों तक पहुंच चुकी है।

राज्य की योजनाएं

वैसे तो मुख्यमंत्री योगी की सरकार में यूपी में महिलाओं के लिए कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इसमें भी दो योजनाएं प्रमुख हैं। इसमें से एक योजना है कन्या सुमंगला योजना जिसके तहत आज प्रधानमंत्री ने 1 लाख लाभार्थियों के खाते में 20 करोड़ से ज्यादा की रकम ट्रांसफर की। इस योजना की पहुंच लगभग डेढ़ लाख लाभार्थियों तक है। इसके अलावा दूसरी योजना है निराश्रित महिलाओं को पेंशन देने की। इस योजना की पहुंच 1.73 लाख अनुमानित है।


महिलाओं को टिकट देने का क्या ट्रेंड रहा है

2017 में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 46 महिलाओं को टिकट दिया, यानी बीजेपी ने  करीब 10% टिकट महिलाओं को दिया। इसमें से 36 महिलाओं को जीत मिली। बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ीं महिलाओं की जीत का स्ट्राइक रेट, 78.26% रहा जबकि पुरुषों का स्ट्राइक रेट 80.70% रहा। सपा ने 34 महिलाओं को टिकट दिया, यानी सपा ने 10.82% टिकट पर महिलाओं को मैदान में उतारा। 1 महिला को ही सफलता मिल सकी। बसपा ने 21 महिलाओं को टिकट दिया, यानी बसपा ने 5.21% टिकट पर महिलाओं को मौका दिया। 2 महिलाओं को ही सफलता मिल सकी। कांग्रेस ने 2017 में 12 यानी 11.76% टिकट पर महिलाओं को मौका दिया, 2 को जीत मिली। कांग्रेस और बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ी महिलाओं की जीत का स्ट्राइक रेट पुरुषों की तुलना में ज्यादा थी। 


2012 में बीजेपी ने ही सबसे ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया था। बीजेपी ने सबसे ज्यादा 11.05% यानी 44 टिकट पर महिलाओं को मौका दिया था, जिसमें से 7 महिलाएं जीत कर विधानसभा पहुंची थीं। 2012 में बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ीं महिलाओं की जीत का स्ट्राइक रेट पुरुषों से ज्यादा थी। 

सपा ने 37 महिलाओं को टिकट दिया था यानी सपा ने 9.22% टिकट पर महिलाओं को मैदान में उतारा था।  जिसमें से 19 महिलाओं को जीत मिली थी। 2012 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़ी महिलाओं की जीत का स्ट्राइक रेट 51.35% रही जबकि पुरुषों का स्ट्राइक रेट 55.49% था। 

बसपा ने 2012 में 7.94% यानी 32 टिकट पर महिलाओं को मैदान में उतारा था। इसमें से 3 महिलाओं को जीत मिली थी। कांग्रेस ने 37 यानी 10.42% टिकट पर महिला कैंडिडेट उतारे थे जिसमें से 3 को जीत मिली थी। 

2012 में ओवरऑल 583 महिलाएं यानी 8.52% महिला प्रत्याशी मैदान में थीं, उसमें से कुल 34 यानी 5.83% महिलाओं ने जीत हासिल की थी वहीं पुरुषों का स्ट्राइक रेट 5.82% था।

बात 2007 की करें, तो 2007 में भी कांग्रेस ने सबसे ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया था। कांग्रेस ने 9.71% यानी 36 टिकट महिलाओं को दिए थे। इसमें से 1 महिला ही चुनकर लखनऊ पहुंची थी। बीजेपी ने 34 यानी 9.71% टिकट पर महिलाओं को मैदान में उतारा, इसमें से 5 कैंडिडेट को जीत मिली थी।

सपा ने 2007 में 27 यानी 6.87% टिकट पर महिलाओं को मैदान में उतारा था, 5 को जीत मिली थी। 

बसपा ने 14 यानी 3.47% टिकट पर महिलाओं को मौका दिया था, इसमें से 10 महिलाओं को जीत मिली थी। बसपा की टिकट पर चुनाव लड़ीं महिलाओं की जीत का स्ट्राइक रेट 71.42% और  पुरुषों का स्ट्राइक रेट 50.38% था।

ओवरऑल 370 यानी 11% महिला प्रत्याशी मैदान में उतरीं थीं, 23 को जीत मिली थी।  महिलाओं की जीत का स्ट्राइक रेट 6.21% जबकि पुरुषों के जीत का स्ट्राइक रेट 11.89% था।

टर्न आउट

अगर टर्न आउट की बात की जाए तो 2007 में महिलाओं का टर्न आउट पुरुषों की तुलना में 7.43% कम था। 2007 में सिर्फ 41.92 महिला वोटरों ने और 49.35% पुरुष वोटरों ने मतदान किया था। जबकि ओवरऑल टर्न आउट 45.96% था। 2012 आते-आते यह सिनेरियो बदल गया और 2012 में महिलाओं का टर्न आउट पुरुषों की तुलना में 1.6% ज्यादा रहा, जबकि ओवरऑल टर्न आउट 59.40% रहा। 2017 के चुनावों में हर रिकॉर्ड टूट गए, यूपी में पहली बार महिलाओं ने बंपर वोटिंग की। पुरुषों की तुलना में महिला टर्न आउट 4.16% ज्यादा रहा।

देश भर में बढ़ रहा महिलाओं का राजनीतिक महत्व

जिन-जिन राज्यों में महिला टर्नआउट बढ़ा उसके पीछे की वजह उन्हें मिला सीधा लाभ भी है। इस बात को बीजेपी ठीक से समझती है, हिमंता बिस्वा सरमा जब असम के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने अपनी जीत राज्य के महिलाओं के नाम कर दी। 

बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की जीत में भी महिलाओं की भूमिका अहम रही। परिवार की महिला हेड को 500 रुपए सीधा लाभ देने का निर्णय इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है। देश के लगभग सभी राज्यों की सरकारों ने महिलाओं को सीधे लाभ देने वाली योजनाएं चला रखी हैं, ये महिलाओं के भारी टर्नआउट की बड़ी वजह है। 

ट्रेंड यह भी बताते हैं कि महिलाओं का ज्यादा टर्नआउट सत्ताधारी दल के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है। उत्तरप्रदेश में ही नहीं, देश भर में महिला टर्नआउट बढ़ रहा है। इसकी दो वजहें हैं पहला महिलायें पहले की तुलना में पॉलिटिकली ज्यादा एक्टिव हो रही हैं और दूसरा पॉलिटिकल डिस्कोर्स में उन्हें ज्यादा शामिल किया जा रहा है। इसकी तस्दीक आंकड़े  भी करते हैं, मिसाल के तौर पर हम यूपी को ले लेते हैं। यूपी में जैसे-जैसे महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ी, वैसे-वैसे महिलाओं का टर्न आउट बढ़ता गया। 

क्या सोचती हैं महिलाएं

2019 में सीएसडीएस ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर, महिलाओं में एक सर्वे किया। सर्वे में पता चला कि 47% महिलाओं को यह लगता है कि पुरुषों की तुलना में महिला नेता, महिलाओं के मुद्दे को ज्यादा तरजीह देगी। शहर की 64% जबकि गांव की 40% महिलाओं का यह मानना है। स्नातक की हुई 61% महिलाएं इससे सहमत हैं जबकि अशिक्षित 35% इससे सहमत हैं। हर श्रेणी में सहमत होने वाली महिलाओं की संख्या असहमत महिलाओं से ज्यादा है।

ट्रेंड यह भी बताते हैं कि महिलाओं का ज्यादा टर्नआउट सत्ताधारी दल के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में महिलाओं के मोर्चे पर जिस स्तर का काम किया है, उससे साफ हो जाता है कि उत्तरप्रदेश में अगर महिला टर्नआउट पिछली बार की तरह ज्यादा रहता है, तो बीजेपी को उसका सीधा लाभ हो सकता है। साथ ही बीजेपी सरकार की योजनाओं की ग्रासरूट लेवल की महिलाओं तक पहुंच भी एक अहम भूमिका निभा सकती है। 

First Published : 21 Dec 2021, 07:18:00 PM

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