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जानें क्या है मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, कोर्ट में चल रहा है केस

कहा जाता है कि मुगल शासन औरंगजेब ने 1669 में श्रीकृष्ण मंदिर की भव्यता से चिढ़कर उसे तुड़वा दिया था और इसके एक हिस्से में ईदगाह का निर्माण कराया गया था.

News Nation Bureau | Edited By : Sunil Chaurasia | Updated on: 23 Mar 2021, 02:08:39 PM
जानें क्या है मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, कोर्ट में चल रहा केस

जानें क्या है मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, कोर्ट में चल रहा केस (Photo Credit: न्यूज नेशन)

मथुरा:

श्रीकृष्ण के भक्तों ने भी मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर में मुगल शासक औरंगजेब के कार्यकाल में बने शाही ईदगाह मस्जिद को वहां से हटाने की मांग की है. इस मामले में मथुरा जिला सिविल न्यायालय में याचिका दायर की गई है. श्रीकृष्ण विराजमान की याचिका में 13.37 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक की मांग की गई है. जानकारी के मुताबिक, आधा दर्जन भक्तों ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही ईदगाह प्रबंध समिति के बीच पांच दशक पूर्व हुए समझौते को अवैध बताते हुए उसे निरस्त करने और मस्जिद को हटाकर पूरी जमीन मंदिर ट्रस्ट को सौंपने की मांग की है. 

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने 25 सितम्बर 2020 (शुक्रवार) को मथुरा की अदालत में दायर की गई याचिका में कहा है कि 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही ईदगाह प्रबंध समिति के बीच हुआ समझौता पूरी तरह से गलत है और भगवान कृष्ण व उनके भक्तों की इच्छा के विपरीत है. इसलिए उसे निरस्त किया जाए और मंदिर परिसर में स्थित ईदगाह को हटाकर वह भूमि मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी जाए.

इन्होंने दायर की याचिका
लखनऊ की रहने वाली रंजना अग्निहोत्री और त्रिपुरारी त्रिपाठी, सिद्धार्थ नगर के राजेश मणि त्रिपाठी और दिल्ली निवासी प्रवेश कुमार, करुणेश कुमार शुक्ला और शिवाजी सिंह ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर में बनी शाही ईदगाह मस्जिद को जमीन देने को गलत बताते हुए सिविल जज सीनियर डिवीजन छाया शर्मा की कोर्ट में दावा पेश किया है.

याचिका में किया ये दावा
श्रीकृष्ण विराजमान, स्थान श्रीकृष्ण जन्मभूमि और उक्त लोगों की ओर से पेश किए दावे में कहा गया है कि 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ (जो अब श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के नाम से जाना जाता है) और शाही ईदगाह मस्जिद के बीच जमीन को लेकर समझौता हुआ था. इसमें तय हुआ था कि मस्जिद जितनी जमीन में बनी है, बनी रहेगी.

मस्जिद को हटाकर मंदिर की जमीन मांगी
वादियों के वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि जिस जमीन पर मस्जिद बनी है, वह श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट के नाम पर है. सेवा संघ की ओर से किया गया समझौता गलत है. इसलिए उक्त समझौते को निरस्त करते हुए मस्जिद को हटाकर मंदिर की जमीन उसे वापस कर देने की मांग की गई है. उन्होंने बताया कि अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि शाही ईदगाह ट्रस्ट ने मुसलमानों की मदद से श्रीकृष्ण से सम्बन्धित जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया और ईश्वर के स्थान पर एक ढांचे का निर्माण कर दिया. भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्मस्थान उसी ढांचे के नीचे स्थित है. 

शाही ईदगाह ट्रस्ट से समझौत को बताया अवैध
याचिका में यह दावा भी किया गया कि मंदिर परिसर का प्रशासन संभालने वाले श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने संपत्ति के लिए शाही ईदगाह ट्रस्ट से एक अवैध समझौता किया. आरोप लगाया कि श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान श्रद्धालुओं के हितों के विपरीत काम कर है इसलिए धोखे से शाही ईदगाह ट्रस्ट की प्रबंध समिति ने कथित रूप से 1968 में संबंधित संपत्ति के एक बड़े हिस्से को हथियाने का समझौता कर लिया.

ये हैं वादी-प्रतिवादी
ये वाद भगवान श्रीकृष्ण विराजमान, कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से उनकी सखी के रूप में अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री और छह अन्य भक्तों ने दाखिल किया है. याचिका में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, कमेटी ऑफ मेनेजमेंट ट्रस्ट शाही ईदगाह मस्जिद, श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट, श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को पार्टी बनाया गया है. भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की सखा रंजना अग्निहोत्री, प्रवेश कुमार, राजेश मणि त्रिपाठी, तरुणेश कुमार शुक्ला, शिवाजी सिंह, त्रिपुरारी तिवारी वादी हैं. जबकि यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, कमेटी ऑफ मैनेजमेंट ट्रस्ट शाही ईदगाह मस्जिद, श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट, श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को पार्टी बनाया गया है.

57 पेज की है याचिका
अधिवक्ता विष्णु जैन और हरिशंकर जैन द्वारा सीनियर सिविल जज छाया शर्मा की अदालत में दायर यह याचिका 57 पेज की है. जिसमें उन्होंने अपनी सारी बातें रखी हैं.

औरंगजेब ने तुड़वा दिया था मंदिर
कहा जाता है कि मुगल शासन औरंगजेब ने 1669 में श्रीकृष्ण मंदिर की भव्यता से चिढ़कर उसे तुड़वा दिया था और इसके एक हिस्से में ईदगाह का निर्माण कराया गया था. इसी ईदगाह को हटाने के लिए कोर्ट में वकील विष्णु जैन और रंजना अग्निहोत्री ने कोर्ट में केस दाखिल किया है.

हिंदू पक्ष का दावा है कि भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्मस्थान उसी ढांचे के नीचे स्थित है, जहां पर प्राचीन केशवराय मंदिर हुआ करता था. दावा ये भी किया जाता है कि 1935 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के हिंदू राजा को मथुरा की विवादित जमीन के अधिकार सौंप दिए थे. इसके बाद 1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर तय हुआ था कि यहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा. वर्ष 1958 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ नाम की संस्था का गठन हुआ, जिसने मुस्लिम पक्ष से समझौता कर लिया.

याचिका में क्या कहा गया है?
भगवान श्रीकृष्ण का मूल जन्म स्थान कंस का कारागार था. कंस का कारागार (श्रीकृष्ण जन्मस्थान) ईदगाह के नीचे है. भगवान श्री कृष्ण की भूमि सभी हिंदू भक्तों के लिये पवित्र है. विवादित जमीन को लेकर 1968 में हुआ समझौता गलत था. कटरा केशवदेव की पूरी 13.37 एकड़ जमीन हिंदुओं की थी.

क्या है 1968 समझौता?
1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर यह तय किया गया कि वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा. इसके बाद 1958 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम की संस्था का गठन किया गया था. कानूनी तौर पर इस संस्था को जमीन पर मालिकाना हक हासिल नहीं था, लेकिन इसने ट्रस्ट के लिए तय सारी भूमिकाएं निभानी शुरू कर दीं. इस संस्था ने 1964 में पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए एक सिविल केस दायर किया, लेकिन 1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ समझौता कर लिया. इसके तहत मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्जे की कुछ जगह छोड़ी और उन्हें (मुस्लिम पक्ष को) उसके बदले पास की जगह दे दी गई.

श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ केस को लेकर सबसे बड़ी रुकावट Place of worship Act 1991 भी है. वर्ष 1991 में नरसिम्हा राव सरकार में पास हुए Place of worship Act 1991 में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के समय धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता. यानी 15 अगस्त 1947 के दिन जिस धार्मिक स्थल पर जिस संप्रदाय का अधिकार था, आगे भी उसी का रहेगा. इस एक्ट से अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि को अलग रखा गया था.

किसने क्या कहा
असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करके कहा है कि प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के मुताबिक, किसी भी पूजा के स्थल के परिवर्तन पर मनाही है. शाही ईदगाह ट्र्रस्ट और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने इस विवाद का निपटारा साल 1968 में ही कर लिया था तो इसे अब फिर से जीवित क्यों किया जा रहा है?

बीजेपी नेता विनय कटियार ने कहा कि जिसने भी याचिका दायर की है उसने अच्छा काम किया है. मथुरा में विराजमान श्री कृष्ण के पक्ष में दाखिल याचिका एक सराहनीय कदम है. विनय कटियार ने कहा कि जहां कृष्ण का जन्म हुआ उस गर्भगृह पर मस्जिद है, रास्ता कृष्ण जन्मभूमि से होकर जाता है जिस पर दूसरे संप्रदाय के लोगों ने बलपूर्वक कब्जा किया है. दूसरा पक्ष जिसे ईदगाह बोलता है वो हिंदुओं का है, जिसको हिंदू पक्ष जीत चुके हैं. उन्होंने कहा कि बिना किसी आंदोलन के प्रशासन नहीं जगेगा. अभी अंदर का हिस्से की लड़ाई बाकी है. ये कब्जे की लड़ाई है.

अयोध्या विवाद में बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे इकबाल अंसारी का कहना है, '' हम हिन्दू-मुस्लिम विवाद नहीं चाहते. कुछ पार्टियां ऐसी हैं कि वह मंदिर-मस्जिद का विवाद चाहती हैं, जिससे उनकी रोजी-रोटी चलती रहे. जो काशी-मथुरा की बात कर रहे हैं वे हिंदुस्तान का माहौल बिगाड़ना चाहते हैं. देश की तरक्की रोकना चाहते हैं.

शाही ईदगाह कमेटी के सचिव तनवीर अहमद ने कहा कि ये विवाद जबरन पैदा किया जा रहा है. कृष्ण की नगरी में सभी भाईचारे के साथ रहते हैं. दोनों ही धार्मिक स्थलों के रास्ते अलग-अलग हैं. पूर्व में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट में सौहार्दपूर्ण ढंग से रजिस्टर्ड समझौता हुआ था. अब कुछ लोग बिना वजह इस मामले तूल देने में लगे हैं. 

मुस्लिम शासकों ने मंदिर तोड़कर सोना लूटा
मान्यता है कि श्रीकृष्ण का जहां जन्म हुआ था. उसी जगह पर उनके प्रपौत्र बज्रनाभ ने श्रीकृष्ण को कुलदेवता मानते हुए मंदिर बनवाया. सदियों बाद महान सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने वहां भव्य मंदिर बनवाया. उस मंदिर को मुस्लिम लुटेरे महमूद गजनवी ने साल 1017 में आक्रमण करके तोड़ा और मंदिर में मौजूद कई टन सोना ले गया. इसके बाद साल 1150 में राजा विजयपाल देव के शासनकाल में एक भव्य मंदिर बनवाया गया. इस मंदिर को 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में सिकंदर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया. इसके 125 साल बाद जहांगीर के शासनकाल में ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने उसी जगह श्रीकृष्ण के भव्य मंदिर का निर्माण कराया. श्रीकृष्ण मंदिर की भव्यता से बुरी तरह चिढ़े औरंगजेब ने 1669 में मंदिर तुड़वा दिया और मंदिर के एक हिस्से के ऊपर ही ईदगाह का निर्माण करा दिया.

इतिहास का सबसे क्रूर शासक था औरंगजेब
इतिहास में औरंगजेब को भारत का सबसे क्रूर और कट्टरपंथी शासक माना जाता है. उसके आदेश पर भारत में सैकड़ों हिंदू मंदिर तोड़े गए. काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने के लिए औरंगजेब का दिया हुआ आदेश आज भी सुरक्षित है और हिंदू पक्ष के मुताबिक मथुरा में औरंगजेब ने कृष्ण मंदिर तोड़कर जो शाही ईदगाह मस्जिद बनावाई. उसके खिलाफ भी कई सबूत मौजूद हैं.

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First Published : 23 Mar 2021, 02:08:39 PM

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