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जानिए कैसे सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा रोहिंग्या मामला

म्यांमार सरकार ने 1982 में राष्ट्रीयता कानून बनाया था जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों का नागरिक दर्जा खत्म कर दिया गया था. जिसके बाद से ही म्यांमार सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करती आ रही है.

News Nation Bureau | Edited By : Shailendra Kumar | Updated on: 08 Apr 2021, 10:51:06 PM
Rohingya case

रोहिंग्या (Photo Credit: News Nation)

नई दिल्ली :

जम्मू में हिरासत में लिए गए 168 रोहिंग्या लोगों को म्यांमार वापस भेजने पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रोहिंग्याओं को नियत प्रक्रिया का पालन किए बिना म्यांमार नहीं भेजा जाएगा. अभी रिहाई नहीं होगी. सभी को होल्डिंग सेंटर में रहना होगा. कुछ रोहिंग्या लोगों की तरफ से वकील प्रशांत भूषण ने याचिका दाखिल कर यह मांग की थी कि इन लोगों को रिहा कर भारत में ही रहने दिया जाए. केंद्र सरकार ने इसका कड़ा विरोध किया था. प्रशांत भूषण ने मांग की थी कि होल्डिंग सेंटर में रखे गए इन लोगों को भारत से वापस न भेजा जाए. साथ ही, भारत में रह रहे सभी रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा दिया जाए. उन्होंने कहा था कि इस बात का कोई सबूत नहीं कि रोहिंग्या लोग भारत की सुरक्षा को खतरा पहुंचा रहे हैं.

कौन हैं रोहिंगिया मुस्लिम

म्यांमार सरकार ने 1982 में राष्ट्रीयता कानून बनाया था जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों का नागरिक दर्जा खत्म कर दिया गया था. जिसके बाद से ही म्यांमार सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करती आ रही है. इस पूरे विवाद की जड़ करीब 100 साल पुरानी है , लेकिन 2012 में म्यांमार के राखिन राज्य में हुए सांप्रदायिक दंगों ने इसमें हवा देने का काम किया. रोहिंग्या मुसलमान और म्यांमार के बहुसंख्यक बौद्ध समुदाय के बीच विवाद 1948 में म्यांमार के आजाद होने के बाद से ही चला आ रहा है. राखिन राज्य में जिसे अराकान के नाम से भी जाता है , 16 वीं शताब्दी से ही मुसलमान रहते हैं. ये वो दौर था जब म्यांमार में ब्रिटिश शासन था.

1826 में जब पहला एंग्लो-बर्मा युद्ध खत्म हुआ तो उसके बाद अराकान पर ब्रिटिश राज कायम हो गया. इस दौरान ब्रिटिश शासकों ने बांग्लादेश से मजदूरों को अराकान लाना शुरु किया. इस तरह म्यांमार के राखिन में पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से आने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई. बांग्लादेश से जाकर राखिन में बसे ये वही लोग थे जिन्हें आज रोहिंग्या मुसलमानों के तौर पर जाना जाता है. रोहिंग्या की संख्या बढ़ती देख म्यांमार के जनरल ने विन की सरकार ने 1982 में बर्मा का राष्ट्रीय कानून लागू कर दिया.

इस कानून के तहत रोहंग्या मुसलमानों की नागरिकता खत्म कर दी गई. रखाइन म्यांमार के उत्तर-पश्चिमी छोर पर बांग्लादेश की सीमा पर बसा एक प्रांत है , जो 36 हजार 762 वर्ग किलोमीटर में फैला है. सितवे इसकी राजधानी है. Rakhin में करीब 29 हजार मुसलमान रहते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की करीब 10 लाख की आबादी को जनगणना में शामिल नहीं किया गया था. रिपोर्ट में इस 10 लाख की आबादी को मूल रूप से इस्लाम धर्म को मानने वाला बताया गया है. जनगणना में शामिल नहीं की गई आबादी को रोहिंग्या मुसलमान माना जाता है. इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं.

रखाइन प्रांत में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है. इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं. बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं. रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है. लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज़ वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं. इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था. म्यांमार की नेता आंग सान सू ची ने रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों को चरमपंथ के ख़िलाफ़ कार्रवाई बताकर उसका बचाव किया था.


रोहिंग्या की संख्या की जानकारी नहीं-गृह मंत्री
11 फ़रवरी 2020 को गृह राज्य मंत्री ने कहा कि अवैध घुसपैठिये बिना किसी दस्तावेज़ के भारत मे इंट्री करते हैं, इसलिए इनकी संख्या का कोई रिकार्ड नहीं है. 25 जून 2019 को भी नित्यानंद राय ने रोहिंग्या की संख्या के बारे में कोई रिकार्ड नहीं होने की बात कही थी, उन्होंने लोकसभा में किये गए सवाल के जवाब में कहा...चूंकि अवैध प्रवासी देश में वैध यात्रा दस्तावेजों के बिना चोरी-छिपे और छलपूर्वक प्रवेश कर जाते हैं अतः देश में रह रहे ऐसे प्रवाससयों की संख्या के सटीक आंकड़े उपलब्ध नही हैं.

40 हज़ार रोहिंग्या का अनुमान
भारत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान 1980 और 1990 से रह रहे हैं जिन्हें यहां रहते हुए करीब 20 साल से अधिक समय हो चुका है. यूएनएचसीआर से रजिस्टर्ड भारत में रहने वाले रोहिंगियों की कुल संख्या 14000 है. एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में कुल 40000 रोहिंगिया हैं. ये रोहिंगिया जम्मू , हैदराबाद , हरियाणा , उत्तर प्रदेश , दिल्ली -एनसीआर और राजस्थान में अलग अलग जगहों पर रहते हैं. भारत में सबसे ज्यादा रोंहिग्या जम्मू में बसे हैं, यहां करीब 10,000 रोंहिग्या रहते हैं.

रोहिंग्या मुस्लिम Illegal activities में शामिल
लोकसभा में 11 फ़रवरी 2020 को गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि कुछ रोहिंग्या मुस्लिम illegal activities में शामिल हैं. नित्यानंद राय से पूछा गया था कि क्या रोहिंग्या के लिंक पाकिस्तान के आतंकी संगठन से हैं.

रोहिंग्या पर राज्यों को केंद्र सरकार का अलर्ट
जून 2018 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर समेत सभी राज्य सरकारों को अवैध आप्रवासियों को रोकने के निर्देश दिए थे .इन आप्रवासियों में म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या भी शामिल हैं. केंद्र की चिट्ठी में रोहिंग्या और अन्य विदेशी आप्रवासियों को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी , जो गैरकानूनी ढंग से जम्मू कश्मीर समेत भारत के अन्य इलाकों में रह रहे हैं. मंत्रालय ने कहा था की , "गैरकानूनी ढंग से रह रहे ये आप्रवासी सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती साबित हो सकते हैं."

मंत्रालय ने कहा, "ऐसी भी खबरें मिली हैं कि कई रोहिंग्या और अन्य विदेशी लोग अपराध, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों, मनी लॉड्रिंग, फर्जी दस्तावेज तैयार करने जैसे कामों में शामिल हैं. ये भी कहा गया था की इनमें से कई फर्जी पैन कार्ड और वोटर कार्ड के साथ देश में रह रहे हैं. इनमें ज्यादातर लोगों ने गैर-कानूनी ढंग से देश में प्रवेश किया है. इसलिए हमें पहले से कहीं ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है."

निर्धारित जगहों पर ही इन्हें रखा जाए. इनकी गतिविधियों और कामकाज पर पुलिस और खुफिया एजेंसियां सख्त निगरानी रखें. इन सभी की निजी जानकारी का ब्यौरा रखा जाए. इसमें नाम, जन्मतिथि, सेक्स, जन्मस्थान, राष्ट्रीयता आदि की जानकारी शामिल होनी चाहिए. अवैध ढंग से रह रहे रोहिंग्या समेत अन्य गैरकानूनी आप्रवासियों का बायोमैट्रिक परीक्षण भी किया जाना चाहिए, ताकि ये भविष्य में अपनी पहचान न बदल सकें. इसके साथ ही ये सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी रोहिंग्या शरणार्थी को आधार कार्ड या अन्य कोई दस्तावेज न जारी किए जाए. रोहिंग्या समेत विदेशी शरणार्थियों का निजी डाटा म्यांमार सरकार के साथ साझा किया जाए ताकि इनकी राष्ट्रीयता का सही पता चल सके.

रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए खतरा
सितंबर 2017 में भारत सरकार ने रोहिंग्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाब में कहा था कि रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए एक खतरा हैं. सरकार ने आशंका जताई थी कि इनका कट्टरपंथी वर्ग भारत में बौद्धों के खिलाफ हिंसा फैला सकता है. कुछ रोहिंग्या मुसलमान, आंतकवादी समूहों से जुड़े हैं जो जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवात क्षेत्र में अधिक सक्रिय हैं. इन क्षेत्रों में इनकी पहचान भी की गई है. सरकार ने आशंका जताई थी कि कट्टरपंथी रोहिंग्या भारत में बौद्धों के खिलाफ भी हिंसा फैला सकते हैं.
खुफिया एजेंसियों का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि इनका संबंध पाकिस्तान और अन्य देशों में सक्रिय आतंकवादी संगठनों से है और ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकते हैं.

सीएए ने बंद किया रोहिंग्या को नागरिकता का रास्ता
सिटिज़नशिप अमेंडमेंट ऐक्ट के बाद रोहिंगिया मुस्लिम के नागरिकता का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है. नए क़ानून के मुताबिक़ पाकिस्तान , बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से धार्मिक अत्याचार के शिकार हिंदू ,सिख, बौद्ध ,जैन ,पारसी और ईसाई को ही नागरिकता मिलेगी. इन सभी रोहिंगिया मुसलमानों को या तो वापस जाना होगा या फिर भारत सरकार इन्हें डिटेंशन कैम्प में ही रखेगी.

भारत में शरणार्थी
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के हालिया अनुमानों के मुताबिक भारत में 2,00,000 शरणार्थी रह रहे हैं और शरणार्थी आबादी के लिहाज से भारत 25वां सबसे बड़ा देश है. यहां तमाम तरह के शरणार्थी हैं—1959 में आए तिब्बती; 1971 में आए बांग्लादेशी; 1963 में आए चकमा; 1983, 1989 और फिर 1995 में श्रीलंका से आए तमिल; और 1980 के दशक के दौरान आए अफगान शरणार्थी. अफगानिस्तान, म्यांमार, सोमालिया, कांगो, इरिट्रिया, ईरान, इराक, सूडान और सीरिया समेत दुनियाभर से शरणार्थी भारत आए हैं. 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो ग्यूटरस ने शरणार्थियों को लेकर भारत के रुख की प्रशंसा करते हुए इसे दुनियाभर के लिए उदाहरण बताया था.

इंटरनेशनल कोर्ट का म्यांमार को आदेश
रोहिंग्या के नरसंहार और अत्याचार रोकने के लिए तुरंत कदम उठाएं. इसी साल जनवरी में आईसीजे ने म्यांमार को आदेश दिया कि रोहिंग्या मुसलमानों को नरसंहार और अत्याचार रोकने के लिए तुरंत कदम उठाएं. कोर्ट ने यह भी कहा कि रोहिंग्या पर किए अत्याचारों के सबूतों को सहेजा जाए. अफ्रीकी देश गांबिया ने कई दूसरे मुस्लिम देशों की तरफ़ से नवंबर 2019 में इंटरनेशनल कोर्ट में याचिका दायर की थी. इसमें म्यांमार पर रोहिंग्या के नरसंहार का आरोप लगाया गया था. 17 जजों ने अपने फैसले में कहा कि म्यांमार सरकार को अपनी क्षमता के हिसाब से रोहिंग्या को अत्याचारों से बचाना चाहिए. इसकी रिपोर्ट 4 महीने में कोर्ट के समक्ष रखने के भी आदेश दिए हैं.

कोर्ट के रोहिंग्या मामले पर फैसला सुनाने से पहले फाइनेंशियल टाइम्स ने म्यांमार की सर्वोच्च नेता आंग सान सू की का आर्टिकल छापा. इसमें उन्होंने कहा कि रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ युद्ध अपराध हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने (रोहिंग्या) इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया. पिछले महीने इंटरनेशनल कोर्ट में सुनवाई के दौरान सू की ने जजों से केस को खारिच करने की भी मांग की थी. म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार के खिलाफ प्रस्ताव पास, 193 देशों में से 134 ने समर्थन किया. दिसम्बर 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार के खिलाफ प्रस्ताव पास, 193 देशों में से 134 ने समर्थन किया. इस प्रस्ताव में रोहिंग्या समेत सभी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बंद करने की मांग की गई. यूएन के 193 सदस्य देशों में से 134 ने प्रस्ताव का समर्थन और 9 देशों ने विरोधकिया. जबकि 28 देश वोटिंग में शामिल नहीं हुए

कौन हैं रोहिंग्या, क्या हुआ इनके साथ
रोहिंग्या एक मुस्लिम जाति का समुदाय है, जो म्यांमार के रखाइन राज्य से ताल्लुक रखता है. एक अनुमान के मुताबिक, पलायन से पहले वहां रोहिंग्याओं की तादाद लगभग 10 लाख थी, लेकिन इसके बाद भी वह अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में थे. इनकी अपनी भाषा और संस्कृति है. म्यांमार सरकार ने कानून में संशोधन करके इसकी नागरिकता का दर्जा खत्म कर दिया जो विवाद का कारण बना.

साल 1962 में म्यांमार की सियासत में बड़े बदलाव के बाद रोहिंग्याओं के अधिकारों को सीमित करना शुरू कर दिया गया. 1982 में एक ऐसा कानून पास किया गया जिसके मुताबिक, रोहिंग्याओं को देश की नागरिकता से बाहर कर दिया गया. इसकी वजह से रोहिंग्याओं का स्कूल, स्वास्थ्य और देश में आने जाने का अधिकार छिन गया.

इसके अलावा म्यांमार सरकार ने रखाइन में सिर्फ दो बच्चे पैदा करने वाली नीति तक लागू कर दी और अंतर्जातीय विवाह पर रोक लगा दी थी. इसके चलते रोहिंग्या मुसलमान देश छोड़ने पर मजबूर हो गए.

स्थिति तब और खराब हो गई जब 2012 में म्यांमार के राखिन राज्य में हुए सांप्रदायिक दंगों ने इसमें हवा देने का काम किया. इस समय हुए एक बौद्ध के रेप और मर्डर के बाद से मुस्लिमों के खिलाफ लगातार बदले के लिए हमले हुए. रखाइन में बढ़ती हिंसा के बाद हजारों लोग बांग्लादेश और पाकिस्तान में पलायन पर मजबूर हो गए

जनवरी 2019- भारत से 1300 रोहिंग्या बंगलादेश भेजे गए

भारत ने 1300 रोहिंग्‍या मुसलमानों को बांग्‍लादेश भेज दिया. सभी को कॉक्स बाज़ार भेजा गया,कॉक्स बाजार बांग्लादेश के दक्षिण का एक जिला है जहां दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर है. भारत के इस कदम की पूरी दुनिया में आलोचना भी हुई. संयुक्‍त राष्‍ट्र और मानवाधिकार समूहों ने भारत पर अंतरराष्‍ट्रीय कानूनों का सम्‍मान नहीं करने का आरोप लगाया.

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First Published : 08 Apr 2021, 10:51:06 PM

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