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लोकसभा चुनाव

क्या है उस कच्छतीवु द्वीप की कहानी जिसके लिए मोदी ने संसद में इंदिरा गांधी का नाम लिया

तमिलनाडु की दोनों राजनीतिक पार्टियां डीएमके और आईडीएमके अक्सर इस मसले को उठाती रही हैं और अब पीएम मोदी ने भी लोकसभा में कच्छतीवु का जिक्र कर दिया है, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या भारत सरकार इस द्वीप को लेकर किए गए इंदिरा गांधी के समझौते को तोड़ देगी.

Updated on: 12 Aug 2023, 03:06 PM

नई दिल्ली:

10 अगस्त को लोकसभा में विपक्ष के लाए अविश्वास प्रस्ताव का जबाव देते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने भारत के दक्षिणी छोर से आगे मौजूद कच्छतीवु द्वीप का मसला उठाया. भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य में स्थित इस द्वीप को लेकर भारत में पिछले कई सालों से चर्चा हो रही है. आखिर इस द्वीप में ऐसा क्या खास है जिसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा के पटल पर कांग्रेस पार्टी को खरी-खरी सुना दी. पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि साल 1974 में तब की पीएम इंदिरा गांधी ने कच्छतीवु को श्रीलंका को तौहफे में दे दिया, जबकि वो द्वीप भारत का हिस्सा था.

अब हम आपको इस द्वीप के इतिहास और भूगोल से रूबरू कराते हैं.. पहले भूगोल की बात करते हैं. कचछतीवु द्वीप भारत के रामेश्वरम और श्रीलंका के मेनलैंड के बीच पाक जलडमरूमध्य में स्थित एक ऐसा द्वीप है जहां कोई नहीं रहता. यानी ये एक निर्जन भूमि है और यहां एक बूंद भी पीने लायक पानी नहीं मिलता. ये द्वीप बंगाल की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ता है. कच्छतीवु भारत के तमिलनाडु राज्य के  रामेश्वरम से 12 मील की दूरी और श्रीलंका के जाफना के नेंदुड़ी से 10.5 मील की दूरी पर है. 285 एकड़ के क्षेत्रफल वाले इस द्वीप की चौड़ाई 300 मीटर है.

भारत-श्राीलंका के बीच पुराना है विवाद

इस द्वीप पर सैंट एंथनी का एक चर्च भी है, जिन्हें मछुआरों का देवता माना जाता है. हर साल इस चर्च में एक त्यौहार भी मनाया जाता है और भारत-श्राीलंका दोनों और के मछुआरे उसमें शिरकत करते हैं. मूंगे की चट्टानों के चलते इस इलाके मे बड़े जहाजों का आवागमन नहीं हो सकता. माना जाता है कि 14वीं शताब्दी में एक ज्वालामुखी विस्फोट के बाद इस द्वीप का निर्माण हुआ था. इस द्वीप को लेकर भारत और श्रीलंका के बीच का विवाद भी काफी पुराना है. ब्रिटिश राज के वक्त भारत और श्रीलंका दोनों के मछुआरे इस द्वीप के ईर्द गिर्द मछलियां पकड़ा करते थे. ये द्वीप रामनाथपुरम के राजा के अधिकार में हुआ करता था और बाद में भारत में अंग्रेजों का राज स्थापित होने के बाद  मद्रास प्रेसीडेंसी के अधीन हो गया.

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मद्रास हाइकोर्ट के एक फैसले के मुताबिक ये द्वीप ब्रिटिश राज का अभिन्न हिस्सा था. साल 1921 में श्रीलंका और भारत के बीच इस द्वीप को लेकर विवाद भी हुआ, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका. आजादी के बाद भी दोनों देशों के बीच इस द्वीप के मानिकान क को लेकर कोई फैसला नहीं हो सका. 1970 के दशक में जब भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा के निर्धारण को लेकर वार्ता शुरू हुई तब 1974-76 में दोनों देशों के बीच फाइनल समझौता हुआ. उस वक्त इंदिरा गांधी भारत की पीएम थीं और श्रीमावो भंडारनायके श्रीलंका के राष्ट्रपति थे. इस समझौते के मुताबिक कच्छतीवु द्वीप श्रीलंका के पास चला गया.

इस द्वीप को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया

इस समझौते के तहत भारत के मछुआरों को इस द्वीप पर बिना वीजा के आराम करने, नेट सुखाने और सेंट एंथनी के फेस्टिवल को मनाने की इजाजत थी. समस्या तब शुरू हुई जब भारतीय मछुआरों ने इस इलाके में मछली पकड़ना शुरू कर दिया. इसके लिए वो बॉटम ट्रॉलर्स का इस्तेमाल किया करते है जिस पर श्रीलंका में पाबंदी लगी है. लिट्टे की बगावत के चलते श्रींलका ने इस इलाके में अपने मछुआरों पर रोक लगा दी थी, लेकिन साल 2010 में लिट्टे की बगावत के खत्म होने के बाद श्रीलंकाई मछुआरे फिर से इस इलाके में मछली पकड़ने लगे और श्रीलंकाई नेवी ने इस इलाके में भारतीय मछुआरों को पकड़ना और उनकी नावों को जब्त करना शुरू कर दिया.

भारत के तमिलनाडु राज्य में कच्छतीवु द्वीप के श्रींलका के हवाले करने का हमेशा से ही विरोध हुआ. 1991 में तमिलनाडु विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित करके इसे द्वीप को फिर से भारत में शामिल करने का मांग की गई. साल 2008 में तत्कालीन जयललिता सरकार ने इस मसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया.

क्या भारत सरकार इस द्वीप को लेकर इंदिरा गांधी के समझौते को तोड़ देगी?

ये मसला अब भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. तमिलनाडु की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां डीएमके और आईडीएमके अक्सर इस मसले को उठाती रही हैं और अब पीएम मोदी ने भी लोकसभा में कच्छतीवु का जिक्र कर दिया है, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या भारत सरकार इस द्वीप को लेकर किए गए इंदिरा गांधी के समझौते को तोड़ देगी? और अगर भारत ने इकतरफा तरीके से इस समझौते को तोड़ा तो क्या श्रीलंका भारत को इंटरनेशनल कोर्ट में नहीं घसीटेगा. 

दक्षिणी चीन सागर में मछली पकड़ने के अधिकार को लेकर ऐसा ही विवाद चीन और फिलीपींस के बीच भी हुआ, जिसमें इंटरनेशनल कोर्ट ने फिलीपींस के हक में फैसला दिया था जिसे चीन ने मानने से इनकार कर दिया. अब देखना होगा कि कच्छतीवु के मसले को लेकर पीएम मोदी का रुख आगे क्या रहता है. क्या वो बस इस मसले पर कांग्रेस की आलोचना करने तक ही सीमित रहेंगे या उनकी सरकार कच्छतीवु को लेकर कोई बड़ा फैसला करेगी.

वरिष्ठ पत्रकार सुमित कुमार दुबे की रिपोर्ट