Explainer: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता...क्या यह अर्थव्यवस्था की नई दिशा है या किसानों के लिए खतरा?

India-US trade deal: इस डील से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि और डेयरी को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है. समझौते में कोई बड़े बाजार खोलने का वादा नहीं किया गया और 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' जैसे नियम तीसरे देशों (जैसे चीन) से डंपिंग रोकेंगे.

India-US trade deal: इस डील से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि और डेयरी को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है. समझौते में कोई बड़े बाजार खोलने का वादा नहीं किया गया और 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' जैसे नियम तीसरे देशों (जैसे चीन) से डंपिंग रोकेंगे.

author-image
Amit Kasana
New Update
India-US trade deal, interim trade agreement 2026, tariffs reduction, US-India joint statement, $500 billion imports, Russian oil shift, farmer protests, economic impact India, bilateral trade agreement BTA

प्रतिकात्मक फोटो (AI IMAGE)

India-US trade deal: दुनिया की तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में आज भारत और अमेरिका के बीच के रिश्ते काफी महत्वपूर्ण हैं. हाल ही में दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौता (Interim Trade Agreement) हुआ है, जो दोनों देशों की अर्थव्यवसथा के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है. 

Advertisment

जानकारी के अनुसार 6 फरवरी 2026 को जारी किए गए संयुक्त बयान में दोनों देशों ने इसके फ्रेमवर्क की घोषणा की थी. बता दें इस  डील का दोनों देशों को लंबे समय से इंतजार था. अर्थशास्त्री मानते हैं कि दोनों विकसित देशों का यह समझौता न सिर्फ टैरिफ घटाने पर केंद्रित है बल्कि ऊर्जा, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाने में मदद करेगा. वहीं, कुछ जानकार इस समझौते के बाद कई सवाल भी खड़े कर रहे हैं. आइए, सरल भाषा में समझते हैं कि यह डील क्या है, क्यों हुई और इसका असर क्या पड़ सकता है.

भारत-अमेरिका को व्यापार समझौते की क्यों पड़ी जरूरत?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंध हमेशा से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए अतिरिक्त 25% टैरिफ थोप दिया था जिससे कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया. इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा नुकसान हुआ. खासकर वस्त्र, जूते-चप्पल और रसायन जैसे क्षेत्रों में इससे भारतीय व्यापारियों का खर्च बढ़ा. जिससे भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' नीति पर असर पड़ा. 

मार्च 2026 तक इसे अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद 

यह समझौता ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच फरवरी 2025 में शुरू हुई द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की वार्ताओं का हिस्सा है. मार्च 2026 तक इसे अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है. दोनों देश चीन से आपूर्ति श्रृंखलाओं को अलग करना चाहते हैं. वहीं, भारत को फिलहाल निवेश और तकनीक की जरूरत है.

इस समझौते से भारत को क्या मिला और उसने अमेरिका को क्या दिया?

इस डील से भारत और अमेरिका दोनों देशों का फायदा हुआ है. डील से जहां अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया है. इससे भारतीय निर्यातकों को राहत मिलेगी, खासकर वस्त्र, चमड़ा, प्लास्टिक, रसायन और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में व्यापारियों को फायदा मिलेगा. इसके अलावा डील से भारत ने अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों (जैसे ड्राई डिस्टिलर्स ग्रेन्स, लाल ज्वार, नट्स, फल, सोयाबीन ऑयल, वाइन और स्पिरिट्स) पर टैरिफ कम या खत्म करने का वादा किया है.

रूसी तेल से निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम 

इस डील से भारत अगले पांच सालों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के सामान खरीदेगा जिसमें ऊर्जा उत्पाद, विमान, धातु और तकनीक शामिल हैं. यह रूसी तेल से निर्भरता कम करने की दिशा में एक कदम है क्योंकि अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाया था. हालांकि, सरकार का कहना है कि यह बाध्यकारी नहीं है बल्कि एक इरादा है.

किसान और युवाओं के लिए लाखों नौकरियां पैदा होने की उम्मीद

इस डील से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि और डेयरी को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है. समझौते में कोई बड़े बाजार खोलने का वादा नहीं किया गया और 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' जैसे नियम तीसरे देशों (जैसे चीन) से डंपिंग रोकेंगे. साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स, आईपी और मेडिकल डिवाइस में गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने पर सहमति बनी है. इसके अलावा डील से फार्मा, जेम्स एंड ज्वेलरी, ऑटो पार्ट्स और जेनेरिक दवाओं पर जीरो टैरिफ मिलेगा. इससे भारत में एमएसएमई, किसान और युवाओं के लिए लाखों नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है.

डील के बाद अब आगे की क्या हैं चुनौतियां?

डील के बाद कुछ चुनौतियां भी हैं जिसका किसान संगठन विरोध कर रहे हैं. बता दें अमेरिकी कृषि उत्पादों के सस्ते आयात से स्थानीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. विपक्ष इसे 'किसान-विरोधी' बता रहा है और 12 फरवरी को प्रदर्शन की धमकी दी है. वहीं, रूसी तेल से शिफ्ट होने से ऊर्जा कीमतें बढ़ सकती हैं जो आम आदमी को प्रभावित करेंगी. उधर, सरकार का दावा है कि किसानों और एमएसएमई की रक्षा की गई है. कुल मिलाकर यह डील भारत की विदेश नीति में एक व्यावहारिक कदम है जहां राष्ट्रीय हितों को संतुलित करते हुए वैश्विक साझेदारी बनाई जा रही है. 

ये भी पढ़ें: Explainer: अकेला अमेरिका नहीं ये ताकतवर देश भी ग्रीनलैंड में दिखा रहे रुचि, खोल दिए अपने दूतावास

World News
Advertisment