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'रेवड़ी कल्चर' पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार और EC को दिए ये निर्देश

शीर्ष अदालत ने चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा दी जा रही रियायतों के मुद्दे को हल करने के लिए सुझाव देने के लिए एक तंत्र या एक विशेषज्ञ निकाय के गठन का भी सुझाव दिया.

Written By : प्रदीप सिंह | Edited By : Pradeep Singh | Updated on: 04 Aug 2022, 04:28:08 PM
supreme court

सुप्रीम कोर्ट (Photo Credit: News Nation)

highlights

  • मुफ्तखोरी पर अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है एक जनहित याचिका 
  • कपिल सिब्बल ने कहा इस मामले पर संसद में बहस होनी चाहिए
  • SC ने सभी हितधारकों से सुभाव लेने का दिया निर्देश

नई दिल्ली:  

राजनीतिक दल चुनावों के समय खूब वादे करते हैं. चुनाव जीतने के लिए कई बार इतने बड़े-बड़े वादे कर दिये जाते हैं कि जिसे पूरा ही नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही अपने वोट बैंक को साधने के लिए भी मुफ्त में रेवड़ी बांटी जाती है. पीएम नरेंद्र मोदी ने 'रेवड़ी कल्चर' को बंद करने की बात कर रहे हैं. उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त वाली घोषणाओं और वायदों पर रोक लगाने की मांग की गयी है. 

याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि कोई भी राजनीतिक दल कभी भी मुफ्त वादे का विरोध नहीं करेगा और कोई भी इस मुद्दे पर बहस नहीं करेगा.भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने राजनीतिक मुफ्तखोरी को विनियमित करने की मांग वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई करने वाली पीठ का नेतृत्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के इस सुझाव का मौखिक रूप से जवाब दिया कि इस मामले पर बहस होनी चाहिए.

शीर्ष अदालत ने चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा दी जा रही रियायतों के मुद्दे को हल करने के लिए सुझाव देने के लिए एक तंत्र या एक विशेषज्ञ निकाय के गठन का भी सुझाव दिया.

एक वकील अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका दायर कर इस तरह के "मुफ्तखोरी" को विनियमित करने की मांग की है.न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की भी पीठ ने याचिकाकर्ता, केंद्र सरकार और भारत के चुनाव आयोग को इस तरह के एक विशेषज्ञ पैनल के गठन पर अपने सुझाव देने का निर्देश दिया.

केंद्र सरकार  भी इस प्रथा के खिलाफ जनहित याचिका के समर्थन में है. इसने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस तरह के मुफ्त उपहार भविष्य में आर्थिक आपदा का कारण बने.केंद्र ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से कहा, "मुफ्त वितरण अनिवार्य रूप से भविष्य की आर्थिक आपदा की ओर ले जाता है और मतदाता भी चुनाव के समय निष्पक्ष तरीके से चुनने के अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते हैं."

केंद्र सरकार ने पहले कहा था कि इस मामले से चुनाव आयोग को निपटना चाहिए.लेकिन, चुनाव आयोग ने 26 जुलाई को इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सरकार पर जिम्मेदारी डाल दी. शीर्ष अदालत ने अब केंद्र, नीति आयोग, वित्त आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक सहित सभी हितधारकों से इस मुद्दे पर मंथन करने और इससे निपटने के लिए रचनात्मक सुझाव देने को कहा है. 

मुफ्त उपहारों पर बहस पर मुख्य न्यायाधीश रमना ने कहा कि कोई भी राजनीतिक दल मुफ्त उपहारों को विनियमित करने के मुद्दे पर बहस करने के लिए तैयार नहीं होगा.वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के इस सुझाव पर जवाब देते हुए कि इस मामले पर संसद में बहस होनी चाहिए, CJI रमना ने कहा: "सिब्बल, क्या आपको लगता है कि संसद में बहस होगी? कौन सी राजनीतिक पार्टी बहस करेगी? कोई राजनीतिक दल ऐसी नहीं होगा जो मुफ्त का विरोध करें.आजकल हर कोई मुफ्त चाहता है.” सिब्बल इस मामले में किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे, लेकिन उन्हें अपनी राय देने के लिए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आमंत्रित किया था. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट बेंच द्वारा दिए गए सभी शीर्ष उद्धरण यहां दिए गए हैं:

आदर्श आचार संहिता के कार्यान्वयन पर: सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग को मामले को देखने पर अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए कहा जा सकता है.चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता लागू करने के मुद्दे के बारे में पूछे जाने पर पीठ ने कहा, 'ये सभी खाली औपचारिकताएं हैं.आदर्श आचार संहिता कब लागू होती है? चुनाव से ठीक पहले.पूरे चार साल आप कुछ न कुछ करते रहेंगे और फिर अंत में एक आदर्श आचार संहिता शामिल करेंगे...'

हितधारकों पर विचार मंथन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी हितधारकों को इस पर विचार करना चाहिए और "गंभीर" मामले से निपटने के लिए सुझाव देना चाहिए.इसने कहा कि केंद्र सरकार, वित्त आयोग, विधि आयोग, आरबीआई के साथ-साथ सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों को सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए और एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया जाना चाहिए."हमारा विचार है कि सभी हितधारक, लाभार्थी ... और सरकार और नीति आयोग, वित्त आयोग, आरबीआई और विपक्षी दलों जैसे संगठनों को इन मुद्दों पर विचार-मंथन और कुछ रचनात्मक सुझाव देने की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए.हम सभी पक्षों को निर्देश देते हैं कि वे इस तरह के निकाय की संरचना के बारे में सुझाव दें ताकि हम निकाय के गठन के लिए एक आदेश पारित कर सकें ताकि वे सुझाव दे सकें."

दिशानिर्देश पारित करने पर: शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वह सभी हितधारकों के विचारों को ध्यान में रखे बिना मुफ्त उपहार के मामले पर कोई दिशानिर्देश पारित नहीं करेगा.CJI रमना ने कहा, “हम दिशानिर्देश पारित नहीं करने जा रहे हैं.यह महत्व का विषय है जहां विभिन्न हितधारकों द्वारा सुझाव लेने की आवश्यकता है.अंततः भारत के चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को कार्यान्वयन पर कदम उठाने की आवश्यकता है.ये सभी समूह बहस कर सकते हैं और फिर वे ईसीआई और सीजी को एक रिपोर्ट सौंप सकते हैं."

चुनाव आयोग की भूमिका पर: 26 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मुफ्त योजनाओं के मामले पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए कहा था, जब सरकार ने कहा था कि चुनाव आयोग को इससे निपटने के तरीकों पर गौर करना चाहिए.यहां तक ​​कि जब चुनाव आयोग ने केंद्र पर वापस जिम्मेदारी डाल दी, तो SC ने कहा, “चुनाव आयोग और सरकार यह नहीं कह सकते कि हम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते.उन्हें इस मुद्दे पर विचार करना होगा और सुझाव देना होगा." जनहित याचिका का समर्थन करते हुए, मेहता ने एक बार फिर कहा कि पोल पैनल को न केवल लोकतंत्र की रक्षा के लिए बल्कि देश के आर्थिक अस्तित्व की रक्षा के लिए फ्रीबी संस्कृति को भी रोकना चाहिए.हालांकि, पोल पैनल के वकील ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले इसे बांधते हैं और इसलिए यह मुफ्त के मुद्दे पर कार्रवाई नहीं कर सकता है.लेकिन सरकार के विधि अधिकारी ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के सुझाव का विरोध किया, जिन्हें पीठ ने सुनवाई के दौरान सहायता करने के लिए कहा है, कि चुनाव आयोग को इससे बाहर रखा जाए.

25 जनवरी को, SC ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा था, जिसमें चुनाव से पहले "तर्कहीन मुफ्त योजनाओं की घोषणा" का वादा करने वाले किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न जब्त करने या पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, यह कहते हुए कि यह एक "गंभीर मुद्दा" है.फ्रीबी बजट नियमित बजट से आगे जा रहा है.

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पंजाब सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले दायर की गई याचिका में कहा गया है कि मतदाताओं से अनुचित राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए ऐसे लोकलुभावन उपायों पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए क्योंकि वे संविधान का उल्लंघन करते हैं, और चुनाव आयोग को उपयुक्त निवारक उपाय करने चाहिए.

First Published : 04 Aug 2022, 04:28:08 PM

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