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Explainer: संसद की कार्यवाही के दौरान कई बार ऐसे प्रस्ताव सामने आते हैं, जिनका राजनीतिक और कानूनी असर दूरगामी हो सकता है. हाल के घटनाक्रम में संसद के बजट सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच काफी हंगामा हुआ. कई मुद्दों पर दोनों पक्ष टकराए भी. दोनों ओर से बयानबाजियां भी हुईं. वहीं लोकसभा स्पीकर को हटाए जाने से लेकर राहुल गांधी के आपत्तिजनक बयानों तक जमकर हंगामा भी हुआ. अब एक शब्द को लेकर काफी चर्चा हो रही है और यह है 'सब्स्टेंटिव मोशन' (Substantive Motion). दरअसल इसे राहुल गांधी की संसद सदस्यता से जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर यह प्रस्ताव होता क्या है और इसका प्रभाव कितना व्यापक हो सकता है?
क्या होता है सब्स्टेंटिव मोशन?
संसदीय भाषा में सब्स्टेंटिव मोशन वह मूल प्रस्ताव होता है, जो सदन के समक्ष स्वतंत्र रूप से रखा जाता है और जिस पर सीधी बहस और मतदान हो सकता है. यह किसी सामान्य चर्चा या अल्पकालिक प्रस्ताव से अलग होता है, क्योंकि इसका उद्देश्य सदन की स्पष्ट राय या निर्णय प्राप्त करना होता है. इसमें सदन के सदस्यों की ओर से वोटिंग का भी प्रावधान है. जिस पक्ष में वोटिंग ज्यादा होती है उसका पलड़ा भारी हो जाता है.
इस प्रकार के प्रस्ताव का इस्तेमाल कई संदर्भों में किया जा सकता है. जैसे किसी उच्च पदाधिकारी के खिलाफ अविश्वास, विशेष कार्रवाई की मांग, या सदन की विशेष अनुशंसा. यदि प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो उसका राजनीतिक संदेश मजबूत माना जाता है.
राहुल गांधी की सदस्यता की बात क्यों?
दरअसल बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के खिलाफ सब्सटेंसिव मोशन दायर किया है. ऐसे में अगर लोकसभा अध्यक्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं तो इस पर चर्चा और वोटिंग होगी. प्रस्ताव पारित होने की सूरत में राहुल गांधी की सदस्यता पर असर पड़ सकता है.
क्या सांसद की सदस्यता इससे खत्म हो सकती है?
भारतीय संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत सांसद की सदस्यता समाप्त होने के स्पष्ट प्रावधान हैं. आम तौर पर सदस्यता समाप्ति के कारणों में आपराधिक दोषसिद्धि, अयोग्यता की घोषणा, दल-बदल कानून का उल्लंघन, या सदन की विशेष कार्यवाही शामिल होती है.
केवल सब्स्टेंटिव मोशन पारित हो जाने से स्वतः सदस्यता समाप्त नहीं होती. हालांकि, यदि यह प्रस्ताव किसी ऐसी कार्रवाई की सिफारिश करता है जो संविधान या कानून के तहत अयोग्यता की ओर ले जाए तो आगे की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. अंतिम निर्णय आमतौर पर स्पीकर, चुनाव आयोग या न्यायपालिका की भूमिका से जुड़ा होता है, यह मामले की प्रकृति पर निर्भर करता है.
राहुल गांधी के संदर्भ में क्यों चर्चा?
राहुल गांधी पूर्व में आपराधिक मानहानि मामले में दोषसिद्धि के बाद अपनी सदस्यता गंवा चुके हैं, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने पर बहाल किया गया. वर्तमान बहस इस आशंका पर आधारित है कि यदि उनके खिलाफ कोई ठोस प्रस्ताव लाया जाता है और वह गंभीर कानूनी परिणामों से जुड़ता है, तो सदस्यता पर प्रभाव पड़ सकता है.
हालांकि संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राजनीतिक मतभेद या बयानबाजी के आधार पर सदस्यता समाप्त करना आसान नहीं है. इसके लिए ठोस संवैधानिक और कानूनी आधार आवश्यक होता है.
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