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आसान भाषा में जानिए आखिर क्या है बोडो समझौता, जिसका जश्न मनाने कोकराझार जा रहे हैं पीएम मोदी

नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Amendment Act-CAA) पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Pm Narendra Modi) अपने पहले असम दौरे पर हैं.

News Nation Bureau | Edited By : Vikas Kumar | Updated on: 07 Feb 2020, 11:45:12 AM
आसान भाषा में जानिए आखिर क्या है बोडो समझौता

आसान भाषा में जानिए आखिर क्या है बोडो समझौता (Photo Credit: फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली:

नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Amendment Act-CAA) पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Pm Narendra Modi) अपने पहले असम दौरे पर हैं. पीएम मोदी हाल ही में हुए बोडो समझौते को लेकर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में भाग लेने के लिए असम के कोकराझार का दौरा करने वाले हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोकराझार में एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे. इस जनसभा का आयोजन बोडो समझौता के उपलक्ष्य में किया गया है. 27 जनवरी को गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में बोडो समझौता पर हस्ताक्षर किया गया था.

समझौते के अनुसार, नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के विभिन्न गुटों के लगभग 1615 कैडरों ने अपने हथियार डाल दिए और समझौते पर हस्ताक्षर होने के दो दिनों के भीतर मुख्यधारा में शामिल हो गए. इस समझौते के तहत क्षेत्र के विकास के लिए लगभग 1500 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज रखा गया है.

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आइये जानते हैं क्या है यह समझौता
दरअसल ये समझौता असम के बोडो आदिवासियों को कुछ राजनीतिक अधिकार और कुछ आर्थिक पैकेज मुहैया कराएगा. असम की क्षेत्रीय अखंडता बरकरार रखी जाएगी तथा एनडीएफबी की अलग राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की प्रमुख मांग नहीं मांगी गई है. यह समझौता राज्य के विभाजन के बिना संविधान की रूपरेखा के अंदर किया गया है. गृहमंत्री समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने को लेकर बहुत उत्सुक थे ताकि असम में बोडो उग्रवाद समाप्त किया जा सके.

जानिए अब तक क्या हुआ-

प्लेन ट्राइबल्स काउंसिल ऑफ असम ( PTCA) के तहत 1966-67 में अलग बोडो राज्य ‘ बोडोलैंड ’ की मांग उठाई गई. ये एक राजनीतिक संगठन था.

· अवैध प्रवासियों को मुद्दा बनाकर 1979 में असम आंदोलन शुरू हुआ.

· 1985 तक चले इस आंदोलन का अंत तब हुआ , जब राजीव गांधी ने ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ( AASU) और असम सरकार को साथ बिठाकर एक असम अकॉर्ड पर दस्तखत कराए.

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· 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन ( ABSU) ने इस मांग को नए सिरे से उठाया. तब ABSU के नेता उपेंद्रनाथ ब्रह्मा ने नारा दिया था- ‘Divide Assam fifty-fifty’ ( असम को 50-50 में बांटो)

· अक्टूबर , 1986 में रंजन दैमारी ने बोडो सिक्योरिटी फोर्स ( BDSF) नाम से एक उग्रवादी संगठन बनाया.

· BDSF ने ही आगे चलकर अपना नाम नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड ( NDFB) किया.

· 1990 के दशक में बोडो उग्रवादियों से निपटने के लिए सेना को लगाया गया. इसने बोडो उग्रवादियों को असम छोड़कर भूटान जाने पर मजबूर कर दिया. लेकिन यहां कूटनीति काम आई और भारत की फौज ने रॉयल भूटान आर्मी को साथ ले लिया.

· 2000 के पहले दशक में दोनों सेनाओं ने NDFB के खिलाफ कई जॉइंट ऑपरेशन चलाए.

· अक्टूबर , 2008 में असम में NDFB के किए बम धमाकों में 90 लोगों की जान गई.

· इन्हीं धमाकों में जनवरी , 2019 में NDFB के 10 सदस्यों और रंजन दैमारी को दोषी पाया गया था.

· इन धमाकों के बाद NDFB दो गुटों में बंट गया था. एक गुट गोबिंदा बासुमातारी का , जिसे NDFB-P कहा गया. दूसरा गुट दैमारी का.

· साल 2009 में गोबिंदा के NDFB-P ने सरकार से बातचीत शुरू की.

· साल 2010 में दैमारी को बांग्लादेश में गिरफ्तार किया गया और भारत के हवाले कर दिया गया.

· साल 2013 में दैमारी को बेल पर रिहा किया गया. इसके बाद NDFB के दैमारी धड़े ने भी सरकार से बात शुरू की.

· साल 2012 में NDFB से एक और धड़ा अलग हुआ.

· NDFB-R से इंग्ती कठार सोंग्बिजित ने अलग होकर NDFB-S बना लिया.

· साल 2015 में सोंग्बिजित को हटाकर बी साओराइग्वारा को अध्यक्ष बनाया गया.

· NDFB-S फौज की कार्रवाई से बचने के लिए म्यांमार चला गया था.

· NDFB-S ने लंबे समय तक भारत सरकार से बातचीत का विरोध किया

· NDFB के धड़े बंटते रहे , लेकिन हिंसा का क्रम बना रहा.

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· साल 2012 में बोडो-मुस्लिम दंगों में सैकड़ों लोगों की जान गई और 5 लाख लोग बेघर हुए. दिसंबर , 2014 में बोडो अलगाववादी गुटों ने असम के कोकराझार और सोनितपुर में 30 से ज़्यादा लोगों को मार डाला.

· 24 नवंबर , 2019 को भारत सरकार ने NDFB पर प्रतिबंध 5 साल के लिए और बढ़ा दिया. इसके बाद नया साल अच्छी खबर लाया.

· 11 जनवरी 2020 को आखिरी बोडो उग्रवादी गुट NDFB-S ने सरकार के सामने समर्पण की घोषणा कर दी. गुट के करीब 50 लड़ाकों ने म्यांमार का अपना बेस छोड़ा और चीफ बी साओराइग्वारा के साथ भारत-म्यांमार सीमा के पास आत्मसमर्पण कर दिया.

· गुवाहाटी में औपचारिकताओं के बाद ये लोग नई दिल्ली के लिए निकल गए.

· 24 जनवरी को गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक विशेष डिविज़न बेंच ने रंजन दैमारी को चार हफ्तों के लिए बेल पर रिहा कर दिया.

· 25 जनवरी को उन्हें जेल से सीधे गुवाहाटी के हवाईअड्डे ले जाया गया , जहां से उन्हें दिल्ली लाया गया.

27 जनवरी को आखिर क्या हुआ ?

27 जनवरी को ये बड़ा समझौता हुआ. इस पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि नौ संस्थानों ने साथ मिलकर एक एग्रीमेंट किया है. उन्होंने कहा कि मैं मानता हूं कि बोडो क्षेत्र और असम के विकास का रास्ता प्रशस्त करने वाला एग्रीमेंट होने जा रहा है. इसके साथ असम के अंदर भी जो इरिटेशन था कि कभी न कभी असम का विभाजन होगा , आज असम अखंड रहकर, अपने साथियों को महत्व देकर, उनको भी विकास की धारा में शामिल कर रहा है. उनकी भाषा , उनकी संस्कृति और उनके अधिकारों को सुरक्षित करके , एक अखंड असम आज हर कोई फील कर रहा है. इसका मुझे बहुत आनंद है.

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क्यों महत्वपूर्ण है 2020 बोडो समझौता?
समझौते के तहत उग्रवादी संगठन नेशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के 1615 कैडर को 30 जनवरी को आत्मसमर्पण कर अपने हथियार सौंपने थे . इस दौरान कई उग्रवादी संगठन देश की मुख्याधारा में शामिल हो गए. उनके कैडर का पुनर्वास किया जाएगा.

First Published : 07 Feb 2020, 10:57:05 AM

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