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इमरान खान (Imran Khan) के New Pakistan का है बुरा हाल, सेना (Pak Army) खाए मलाई आवाम मरे भूखे

पाकिस्तान (Pakistan) के हुक्मरानों पर भ्रष्टाचार का आरोप जड़ने वाले 'इमरान नियाजी' यह भी नहीं कबूल कर सके कि उनकी आर्थिक दुश्वारियों के लिए भी पाकिस्तानी सेना (Pakistan Army) ही 100 फीसदी जिम्मेदार है. उसकी सरपरस्ती में न सिर्फ रियल इस्टेट बल्कि खेती-किसानी से लेकर चीनी मिलों, रसायनिक खाद, तेल, घरेलू उड्डयन, बैंकिंग तक के काम चलते हैं.

By : Nihar Saxena | Updated on: 30 Sep 2019, 11:21:52 AM
पाकिस्तानी सेना की सरपरस्ती में ही चलता है मादक पदार्थों का धंधा.

पाकिस्तानी सेना की सरपरस्ती में ही चलता है मादक पदार्थों का धंधा.

highlights

  • पाकिस्तान की आर्थिक दुश्वारियों के लिए पाक सेना ही 100 फीसदी जिम्मेदार है.
  • 80 प्रतिशत राजनेता हजारों एकड़ कृषि योग्य जमीन के मालिक हैं.
  • पाक सेना के साम्राज्य में 50 अलग-अलग औद्योगिक उपक्रम चल रहे हैं.

नई दिल्ली:

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सत्र में पाकिस्तान (Pakistan) के वजीर-ए-आजम इमरान खान ने सिर्फ भारत के खिलाफ ही जहर नहीं उगला, बल्कि पाकिस्तान के अस्तित्व पर संकट लाने वाली आर्थिक तंगी (Financial Distress) समेत तमाम अन्य दुश्वारियों के लिए पूर्व हुक्मरानों पर भी ठीकरा फोड़ा. हालांकि वह एक कड़वे सच को अपनी जबान पर लाने की हिम्मत नहीं कर सके. वे यह साहस नहीं जुटा सके कि पाकिस्तान में सेना ही सर्वोच्च है और प्रधानमंत्री (Pak PM) भले ही कोई रहा, लेकिन वह सेना के हाथों की कठपुतली (DeFacto) ही रहा. यहां तक कि पाकिस्तान के हुक्मरानों पर भ्रष्टाचार का आरोप जड़ने वाले 'इमरान नियाजी' यह भी नहीं कबूल कर सके कि उनकी आर्थिक दुश्वारियों के लिए भी पाकिस्तानी सेना (Pakistan Army) ही 100 फीसदी जिम्मेदार है. उसकी सरपरस्ती में न सिर्फ रियल इस्टेट बल्कि खेती-किसानी से लेकर चीनी मिलों, रसायनिक खाद, तेल, घरेलू उड्डयन, बैंकिंग तक के काम चलते हैं.

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पाक सेना की शह से ही बनते आए हैं प्रधानमंत्री
दुर्भाग्य की बात तो यह है कि इन सबसे होने वाले जबर्दस्त फायदे का एक रुपया भी आम पाकिस्तानियों (Pakistan Citizens) के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए खर्च नहीं होता है. यही वजह है कि पाकिस्तान सेना के शीर्ष अधिकारियों के विदेशों में न सिर्फ आलीशान बंगले हैं, बल्कि 'टैक्स हैवन' कहे जाने वाले देशों में बेनामी खाते (Benami Accounts) भी हैं. इसकी और इमरान खान ने अपने संबोधन में इशारा जरूर किया था. इतिहास गवाह है कि भारत की आजादी के साथ ही अस्तित्व में आए इस देश में 48 सालों तक पाकिस्तानी सेना का ही शासन रहा है. यही नहीं, चुनी सरकारें भी सेना की कठपुतली ही साबित हुई हैं. वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran Khan) भी इससे अछूते नहीं रहे हैं. विपक्षी दल इस सच्चाई को बीते एक साल में कई बार उठा चुके हैं कि इमरान खान को वजीर-ए-आजम बनाने के लिए पाकिस्तान सेना ने तमाम तरह के धत्कर्म किए.

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पाकिस्तान सेना के चल रहे 50 औद्योगिक-व्यावसायिक उपक्रम
पाकिस्तान सेना की 'रईसियत' का खाका प्रसिद्ध लेखिका डॉ. आयश सिद्धिकी आगा ने अपनी किताब 'इनसाइड पाक मिलिट्री इकोनॉमी' में खुल कर खोला है. इस किताब में उन्होंने साफ-साफ सेना को कठघरे में खड़ा किया और लिखा कि पाक सेना (Pakistan Army) के फौजी शासन के अलावा लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आई सरकारें भी सेना के हाथों ब्लैकमेल (Blackmail) होती रहीं. समय-समय पर चुनकर आए पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने सत्ता में बने रहने के लिए सेना को बतौर रिश्वत अर्थव्यवस्था (Pakistan Economy) में पब्लिक तथा प्राइवेट सेकटर व्यापार का बड़ा हिस्सा सौंप दिया. पाकिस्तान सेना के औद्योगिक साम्राज्य का सालाना टर्नओवर 2012 तक 20 मिलियन ब्रिटिश पाउंड आंका गया था. आयशा सिद्दकी के आरोपों की पुष्टि 2016 में तत्कालीन रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने की थी. उनके मुताबिक पाकिस्तानी सेना के साम्राज्य में 50 अलग-अलग प्रकार के औद्योगिक उपक्रम चल रहे हैं.

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सब कुछ पाक सेना की भलाई के नाम पर
हद तो यह है कि पाकिस्तान सेना ने इन औद्योगिक (Industrial) और व्यावसायिक (Business) उपक्रमों को चलाने के लिए पाक सैनिकों की आड़ ली हुई है. पाकिस्तानी सैनिकों की भलाई का दिखावा करने के लिए पाक सेना ने कुछ संस्थाओं का गठन 1960 से ही शुरू कर दिया था. इनमें प्रमुख हैं फौज फॉउंडेशन, आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट (AWT), शाहीन फॉउंडेशन, वहरिया फॉउंडेशन, नेशनल लॉजिस्टिक सेल और फ्रंटियर वर्क्स जैसे नाम प्रमुख हैं. गौरतलब यह है कि इन संस्थाओं को स्थापित करने के लिए पाक सरकार से ही निवेश (Investment) कराया गया. ये संस्थाएं अलग-अलग कामों को अंजाम देती हैं और इसमें उनकी मदद करते हैं पाक सेना के उच्च पदों पर बैठे शीर्ष अधिकारी.

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सरकार से लेती है करों में छूट पाक सेना
गौरतलब है कि नेशनल लॉजिस्टिक सेल का मुख्य व्यवसाय भारी सामान की ढुलाई (Heavt Transportation) है. इसके लिए उसके पास 2000 बड़े ट्रक हैं तथा इसमें 2442 सेवारत तथा 4136 सेवानिवृत्त पाक सेना के कर्मी काम करते हैं. इसी तरह फ्रंटियर वर्क्स पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में सड़कों का निर्माण करती है. सेना की ये संस्थाएं पाक में रेस्टोरेंट, बैकरी, मीट और रोजमर्रा की वस्तुओं की आपूर्ति करती हैं. बैंकिंग (Banking) जैसे वित्तीय मामलों में भी पाकिस्तान सेना का ही दखल है. शाहीन और अशकारी बैंकों का देशव्यापी नेटवर्क है. इसके अलावा इन संस्थानों का दवा बनाने, रासायनिक खादों और तेल उत्खनन के क्षेत्र में भी दखल है. इनसे प्राप्त आय और मुनाफा सेना के सेवारत और सेवानिवृत कर्मियों की जेब में जाता है. यही नहीं, पाक सेना अपने रूतबे का इस्तेमाल करके इन व्यापारिक गतिविधियों पर लगने वाले करों (Taxes) पर भी भारी छूट सरकार से लेती है. 2015 में पाक सेना ने सरकार से 6000 करोड़ रूपये की छूट हासिल की थी. पाकिस्तान के एकमात्र तेल के कुंए पोर्ट कासिम का दारोमदार ही पाक सेना के पास है, तो बिजली उत्पादन के कबीर वाला पावर प्लांट पाक सेना का है.

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246 जागीरदार परिवारों के पास लगभग 90 फीसदी जमीनें
ऐसा नहीं है कि यह सब पाकिस्तानी सेना ने रातों रात कर लिया है, वह भी बगैर किसी मदद के. पाकिस्तानी लेखिका तहमीना ईरानी ने अपनी किताब 'माई फ्यूडल लार्ड' में इसके लिए पाकिस्तानी अवाम को भी ज़िम्मेदार ठहराया है. उनके मुताबिक वहां पर अभी भी जमींदारी (Zamindars) तथा जागीरदारी प्रथा (Feudalism) चलती है. आज भी ज्यादातर पाकिस्तान की खेती (Agriculture) योग्य जमीन पर सिर्फ 246 जागीरदार परिवारों का ही मालिकाना हक है. निजी हितों के चलते पाकिस्तान में अभी तक भूमि सुधार या जमींदारी उन्मूलन जैसे कानूनों के बारे में कोई बात नहीं होती. अपने इस रूतबे को बनाये रखने के लिए ये जागीरदार सेना को अपने साथ रखते हैं. एक गौर करने वाली बात यह भी है कि वहां के ज्यादातर राजनीतिज्ञ (Politicians) तथा सेना के अधिकारी इन्हीं परिवारों में आते हैं. इस प्रकार अभी तक पाकिस्तान में सामंती व्यवस्था पूरी तरह से लागू है, जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) तथा दुनिया का सभ्य समाज इसे सामाजिक समरसता और बराबरी की राह में बड़ा रोड़ा मानकर इसके खात्मे की वकालत करता आया है.

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पाक सेना की शह पर होती है बंधुआ मजदूरी
करेला वह भी नीम चढ़ा की तर्ज पर ये जमींदार परिवार बंधुआ मजदूरी (Bonded Labour) को भी प्रश्रय देते हैं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. पाकिस्तान की राजनीति के बड़े नाम इस बुराई से अछूते नहीं हैं. मसलन भुट्टो (Bhutto Family) परिवार 40,000 एकड़, गुलाम मुस्तफा जतोई 30,000 एकड़ जमीन के मालिक हैं. ऐसे ही हिना रब्बानी खार, शाह महमूद कुरैशी, वालाक शेर मजारी, महम्मद मियां सुमरो, नवाब बुग्ती, पूर्व प्रधानमंत्री जफरउल्ला खान जमाली के अलावा 80 प्रतिशत राजनेता हजारों एकड़ जमीन के मालिक हैं. इन सामंतों ने अपनी जमीनों पर बेगार करवाने के लिए हजारों किसानों तथा मजदूरों को अपनी जेलों (Private Jail) में बंद कर रखा है. देहातों में 49 फीसदी लोग अशिक्षित हैं. सरकार और पाकिस्तानी सेना में गहरी दखल के चलते बंधुआ मजदूरी कराने के बावजूद उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. बिगाड़ना तो दूर इस तरह की कोई शिकायत भी पुलिस में दर्ज नहीं होती.

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जागीरदारों के पैसों से होती है आतंकवादियों की मदद
पाकिस्तान सेना और उसकी मिलीभगत से फलने-फूलने वाली सामंतशाही ने ही आज उसे विफल देश की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है. यह सामंतशाही ही है जिसने आतंकवाद (Terrorism) को बढ़ावा दिया. गौर करें विश्व के दुर्दांत आतंकी संगठनों का जुड़ाव कहीं न कहीं पाकिस्तान से देखने में आता है. इस कारण ही पाकिस्तान में न तो शिक्षा का प्रसार हुआ और न ही उसे आर्थिक उदारीकरण का कोई लाभ मिला. इनके अपने नियम-कायदों के चलते विदेशी निवेशक (Foreign Investors) भी पाकिस्तान में निवेश करने से कतराते हैं. और तो और, लगातार घाटे का सौदा साबित हो रहे कृषि क्षेत्र ने इन जागीरदारों और जमींदारों को अपने कब्जे के भू-भाग को विदेशियों को बेचने को प्रेरित किया. नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान की काफी जमीन पर सऊदी अरब (Saudi Arab) तथा खाड़ी देशों (Gulf Countries) के लोगों का कब्जा है. पाकिस्तान की इसी दुर्दशा का फायदा चीन (China) उठा रहा है. चीन ने पाकिस्तान को एक तरह से कर्ज के हिमालय के नीचे दबा रखा है. चीन का आर्थिक गलियारे (ORON) तो एक पहचान भर है कि वहां चीन का कब्जा महज रस्मी रवायत ही बचा है.

First Published : 29 Sep 2019, 06:21:51 PM

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