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Sankashti Chaturthi Vrat Katha
Sankashti Chaturthi Vrat Katha: हिंदू धर्म में द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी तिथि का विशेष महत्व होता है. यह तिथि भगवान गणेश की पूजा के लिए समर्पित होती है, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है जिसका अर्थ होता संकटों से मुक्ति दिलाने वाली तिथि. ऐसे में आज यानी 05 फरवरी, गुरुवार को फाल्गुन मास की द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है. आज भक्त शुभ मुहूर्त में विधि-विधान के साथ गणेश जी की पूजा करते हैं और रात में चंद्रोदय होने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा होती है. मान्यता है इस व्रत कथा के बिना संकष्टी चतुर्थी की पूजा अधूरी मानी जाती है. यदि आप किसी कारण कथा का पाठ नहीं कर पाते हैं तो श्रवण जरूर करें. चलिए पढ़ते हैं व्रत कथा.
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (Sankashti Chaturthi Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता पार्वती पुत्र गणेश से फाल्गुन कृष्ण पक्ष पक्ष की चतुर्थी व्रत के बारे में पूछती हैं. तब भगवान गणेश आसान शब्दों में जबाव देते हुए कहते हैं हे माता फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है. मैं आपको इस कथा का वर्णन करता हूं. एक समय की बात है युवनाश्व नाम का एक दयालु और धर्मनिष्ठ राजा राज्य करता था. उसी राज्य में विष्णुशर्मा नाम का एक ब्राह्मण था जिसके 7 पुत्र थे. लेकिन ब्राह्मण के परिवार में लड़ाइ-झगड़ा होता रहता था जिस कारण उसके पुत्र अलग-अलग स्थानों पर जाकर रहने लगे. ब्राह्मण विष्णुशर्मा हर दिन बारी-बारी से अपने पुत्रों के घर पर भोजन करने जाया करते थे. धीरे-धीरे समय बीता और वे शारीरिक रूप से अधिक दुर्बल हो गए. बहुएं भी अपने ससुर की तारीफ करने लगी.
छोटी बहू के घर की भगवान गणेश की पूजा
फिर एक दिन संकष्टी चतुर्थी थी. विष्णुशर्मा अपनी बड़ी बहू के घर जाकर बोले आज मेरा भगवान गणेश का व्रत है तुम मेरे लिए पूजा सामग्री की व्यवस्था कर दो तुम्हें भगवान गणेश का आशीर्वाद मिलेगा. लेकिन बहू ने घर के कामों का बहाना देकर मना कर दिया. ब्राह्मण विष्णुशर्मा वहां से चले गए. एक-एक कर वे सभी बहुओं के घर गए लेकिन किसी ने उनके लिए पूजा सामग्री की व्यवस्था नहीं की. तब आखिर में वे छोटी बहू के घर गए जो बहुत निर्धन थी. छोटी बहु की आर्थिक स्थिति देख पहले तो विष्णुशर्मा ने विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा की.
भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर धन किया प्रदान
पूजा के बाद रात में उन्होंने व्रत खोला. व्रत के प्रभाव से छोटी बहू का घर धन-संपत्ति से भर गया. भगवान गणेश ने ब्राह्मण की पुत्र वधू की पूजा और दयालुता से प्रसन्न होकर उसे कुबेर समान धन प्रदान किया. इसलिए कहा जाता है कि जो भी यह व्रत करता है उसकी सारी समस्याएं दूरी होती हैं.
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