/newsnation/media/media_files/2026/03/02/masan-holi-2026-1-2026-03-02-11-47-12.jpg)
Masan Holi 2026
Masan Holi 2026: दुनियाभर में रंगों का त्योहार होली गुलाल के साथ 04 मार्च 2026 को मनाई जाएगी, लेकिन बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में एक ऐसी अनोखी होली खेली जाती है जो अद्भुत होती है. वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चिता की होली खेलनी की परंपरा सदियो से चली आ रही है. ऐसे में चलिए हम आपको इस आर्टिकल में बताते हैं इस अनोखी मसान होली खेलने की परंपरा के बारे में साथ ही इसकी शुरुआत किसने की थी.
चिता की राख से क्यों खेली जाती है होली?
दरअसल काशी में यह परंपरा रंगभरी एकादशी के बाद निभाई जाती है. इस बार रंगभरी एकादशी 27 फरवरी को थी इसलिए 28 फरवरी को काशी में चीता की रखा से होली खेली जाती है. जहां एक और श्मशान का नाम सुनकर डर लगने लगता है. वहीं महादेव के भक्त यहां राख उड़ाकर मुत्यु के उत्सव का आनंद लेते हैं. इस अनोखी होली को मसान होली भी कहा जाता है. माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत स्वयं भगवान शिव ने की थी जिसके पीछे एक गहरा कारण छिपा हुआ है.
भगवान शिव से क्या है संबंध?
मान्यताओं के अनुसार, होली का संबंध भगवान शिव से जोड़ा जाता है. भगवान शिव को महाकाल और श्मशानवासी कहा जाता है जिन्हें भस्म बेहद पसंद है. मान्यता है कि काशी में स्वयं भगवान शिव का निवास है और यहां मृत्यु भी मोक्ष का द्वार मानी जाती है. इसलिए यहां जीवन के अंत को भी उत्सव की तरह मनाया जाता है.
कैसे शुरू हुई यह परंपरा?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने ही इस अनोखी होली की शुरुआत की थी. रंगभरी एकादशी पर उन्होंने गुलाल से होली खेली. लेकिन अपने गणों के साथ भस्म की होली अगले दिन खेली. तभी से यह परंपरा चली आ रही है. मसान होली सिर्फ एक उत्सव नहीं है. यह जीवन और मृत्यु के गहरे सत्य को समझाने वाली आध्यात्मिक परंपरा है.
यह भी पढ़ें: Kamadeva Story: आखिर क्यों महादेव ने प्रेम के देवता कामदेव को कर दिया था भस्म? होली से जुड़ी है पौराणिक कथा
/newsnation/media/agency_attachments/logo-webp.webp)
Follow Us