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Ellora Kailash Temple: इंसानों ने नहीं इन महाशक्तियों ने किया है 4 लाख टन पत्थर से बने इस शिव मंदिर का निर्माण 

Mysterious Shiva Temple: एलोरा के कैलाश मंदिर का रहस्य आज भी रहस्य बना हुआ है. इस मंदिर को देखकर आम लोगों से लेकर वैज्ञानिक तक सब आचंभे में है कि इसका निर्माण आखिर कैसे किया गया होगा. 

Updated on: 14 Jun 2024, 12:43 PM

नई दिल्ली:

Mysterious Shiva Temple: एलोरा के कैलाश मंदिर का निर्माण किसने करवाया ये आज भी रहस्य बना हुआ है. कैलाश मंदिर, जो औरंगाबाद के एलोरा में स्थित है, शिव मंदिरों में अपनी भव्यता और अनोखी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. यह मंदिर 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया था. माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण एक बड़े पहाड़ को तराशते हुए किया गया था, जो आज के युग में भी असंभव सा लगता है. इसके निर्माण में 400,000 टन पत्थर का उपयोग हुआ था और इसे बनाने में केवल 18 साल लगे थे. मंदिर के रहस्यमयी निर्माण की गुत्थियाँ विज्ञान भी सुलझा नहीं पाया है.

अगर भारत को मंदिरों का देश कहा जाए तो गलत नहीं होगा, क्योंकि यहां इतने मंदिर हैं कि अब गिनते गिनते थक जाएंगे, लेकिन गिन नहीं पाओगे. यहां ऐसे कई मंदिर हैं जो अपनी भव्यता और अनोखी मान्यताओं के लिए जाने जाते हैं. औरंगाबाद के एलोरा में स्थित कैलाश मंदिर के रहस्यों से आजतक वैज्ञानिक भी अनजान हैं. अलोरा का कैलाश मंदिर अत्यंत विशाल है और अद्भुत है. लेकिन, आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मंदिर का निर्माण एक बड़े पहाड़ को ऊपर से नीचे की और तराशते हुए किया गया जो आज के युग में भी नामुमकिन सी बात लगती है. यही नहीं मंदिर के निर्माण समय को लेकर भी रहस्य अभी तक बरकरार है. 

कैलाश मंदिर जितना रहस्यमयी है, उतनी ही रहस्यमयी बनाने की कला भी है. इस मंदिर में किसी भी तरह की ईट या चुने का इस्तेमाल नहीं किया गया है. कहते हैं कि इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में हुआ था और इसे बनाने में केवल 18 साल लगे थे. जबकि पुरातत्व विज्ञान की मानें तो 4,00,000 टन पत्थर को काटकर किए गए इस मंदिर का निर्माण इतने कम समय में संभव ही नहीं है. उनकी माने तो अगर 7000 मजदूर 150 वर्षों तक दिन रात काम करें तो ही इस मंदिर का निर्माण संभव है जो कि नामुमकिन सी बात है. ऐसे में इस मंदिर का निर्माण मनुष्य द्वारा तो इतने कम समय में संभव ही नहीं है.

मंदिर को लेकर जानकारी मिलती है की इसका निर्माण राष्ट्र कुल के राजा कृष्ण प्रथम ने करवाया था. कहा जाता है की एक बार राजा गंभीर रूप से बीमार हो गये थे. तमाम इलाज के बाद भी स्वस्थ नहीं हो पा रहे थे, तब रानी ने भोलेनाथ से प्रार्थना की कि वह राजा को स्वस्थ करें तो उनके स्वस्थ होते ही वह मंदिर का निर्माण करवाएगी और मंदिर का शिखर देखने तक व्रत रखेंगी. तब राजा स्वस्थ हो गए, लेकिन रानी को बताया गया की मंदिर का निर्माण और शिखर बनने में तो कई वर्ष लगेंगे. ऐसे में इतने वर्षों तक व्रत रख पाना संभव ही नहीं होगा. तब रानी ने भोलेनाथ से मदद मांगी. मान्यता है कि तब उन्हें भूमि अस्त्र मिला जो पत्थर को भी भाप में बदल सकता था. इस अस्त्र का जिक्र ग्रंथों में भी मिलता है कि इस अस्त्र से इस मंदिर का निर्माण हुआ और मंदिर बनने के बाद उस अस्त्र को मंदिर के नीचे गुफा में रख दिया गया.

दुनिया भर के वैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि इतने कम समय में शक्तियों द्वारा ही ऐसे मंदिर का निर्माण संभव है अन्यथा आज के समय में भी ऐसे मंदिर इतने कम समय में और एक पत्थर को ऊपर से नीचे तलाश कर बनाना संभव नहीं है. मंदिर में 100 से ज्यादा पैनल हैं. इनके ऊपर भगवान विष्णु के कई रूप और महाभारत के दृश्य चित्रित हैं. इस मंदिर की दीवारों पर अलग तरह की लिपियों का प्रयोग किया गया है. इसके बारे में आज तक कोई कुछ नहीं समझ पाया है. 

कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान अंग्रेजों ने मंदिरों के नीचे गुफाओं पर शोध कार्य शुरू किये लेकिन वहां रेडियो एक्टिविटी के चलते शोध कर पाना मुश्किल हो गया. मान्यता है की वहां पर भूमि, अस्त्र और मंदिर के निर्माण में प्रयोग किये गए अस्त्र हो सकते हैं. अब अंग्रेजों ने यहां रिसर्च बंद करके इन गुफाओं को बंद कर दिया. बता दें कि आजादी मिलने के बाद भी इन गुफाओं को बंद ही रखा गया है.

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं. न्यूज नेशन इस बारे में किसी तरह की कोई पुष्टि नहीं करता है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)