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Happy Navratri 2019: जानिए मां दुर्गा के स्वरूप शैलपुत्री की कथा और पूजा विधि, देखें VIDEO

हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए आज से हिन्दू नववर्ष शुरू हो गया है. विक्रम संवत 2076 चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा शनिवार से वासंती नवरात्र के साथ शुरू हो गया है

News Nation Bureau | Edited By : Dalchand Kumar | Updated on: 06 Apr 2019, 04:30:52 PM
मां शैलपुत्री

मां शैलपुत्री

नई दिल्ली:

हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए आज से हिन्दू नववर्ष शुरू हो गया है. विक्रम संवत 2076 चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा शनिवार से वासंती नवरात्र के साथ शुरू हो गया है. धूमधाम के साथ नौ दिनों तक पूरे विधि-विधान के साथ मां दुर्गा की पूजा अर्चना की जाएगी. ब्रह्म पुराण के मुताबिक ब्रह्मा ने इसी संवत में सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की थी. ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक शनिवार को रेवती नक्षत्र में नवरात्र शुरू हो गया है. नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है

मां शैलपुत्री की कथा
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया. इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, लेकिन शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया. सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा.

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई. सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं. अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है. उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है. कोई सूचना तक नहीं भेजी है. ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा.

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शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ. पिता का यज्ञ देखने, वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी. उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी. सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है. सारे लोग मुंह फेरे हुए हैं. केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया. बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे.

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुंचा. उन्होंने यह भी देखा कि वहां चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है. दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे. यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा. उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहां आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है.

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वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं. उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया. वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध हो, अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया.

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया. इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुईं. पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं. उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था.

मां दुर्गा के स्वरूप शैलपुत्री की पूजा विधि

मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं. इसके ऊपर केशर से शं लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें. तत्पश्चात हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें. मंत्र इस प्रकार है- ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:

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मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड दें. इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें. यह जप कम से कम 108 होना चाहिए. मंत्र - ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम: । मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां के चरणों में अपनी मनोकामना को व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा श्रद्धा से आरती कीर्तन करें.

मां शैलपुत्री का भोग -
मां शैलपुत्री को सफेद चीजों का भोग लगाया जाता है और अगर यह गाय के घी में बनी हों तो व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है और हर तरह की बीमारी दूर होती है.

यह वीडियो देखें-

First Published : 06 Apr 2019, 04:30:35 PM

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