New Study: ‘Gen-Z के पास अपने माता-पिता से कम IQ’, नई रिसर्च में हुआ खुलासा; जानें वजह

New Study: एक नई रिसर्च में सामने आया कि जेन-Z की बौद्धिक क्षमता अपनी पिछली पीढ़ी से कम है. आखिर इसकी वजय क्या है, आइये जानते हैं…

New Study: एक नई रिसर्च में सामने आया कि जेन-Z की बौद्धिक क्षमता अपनी पिछली पीढ़ी से कम है. आखिर इसकी वजय क्या है, आइये जानते हैं…

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Jalaj Kumar Mishra
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Gen Z Becomes First Generation Less Intelligent Than Parents Experts Blame EdTech

File Photo (Freepik)

New Study: समाज में अधिकांश लोगों को लगता है कि जेन-जी अपने माता-पिता की पीढ़ी से ज्यादा स्मार्ट है लेकिन जेंजीस पर हुई एक रिसर्च इसके ठीक उलट है. रिसर्च में सामने आया कि जेनजी पहली ऐसी पीढ़ी है, जो बौद्धिक क्षमता में अपने माता-पिता की पीढ़ी से काफी कम है. ये रिसर्च न्यूरोसाइंटिस्ट और पूर्व शिक्षक डॉ. जारेड कूनी होर्वाथ ने किया है. उन्होंने इस कमी की वजह स्कूलों में डिजिटल तकनीक पर बढ़ती निर्भरता को बताया है.

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जानें डॉ. होर्वार्थ ने क्या कहा

अमेरिकी सीनेट की वाणिज्य, विज्ञान और परिवहन समिति को डॉ. होर्वाथ ने बताया कि जेन-जी छात्रों में ध्यान, याददाश्त, पढ़ाई-लिखाई, प्रॉब्लम सॉल्विंग और IQ में गिरावट देखी गई है. खास बात है कि ये गिरावट भी तब हो रही है, जब जेनजी पीढ़ी के बच्चे, 20वीं सदी के बच्चों की तुलना में कहीं अधिक वक्त स्कूलों में बिता रही है. डॉक्टर ने अमेरिकी संसद में बताया कि इंसानी दिमाग छोटे वीडियो क्लिप्स, बुलेट प्वाइंट्स और स्क्रीन पर तेजी से बदलती जानकारियों से सीखने के लिए बायोलॉजिकली रेडी ही नहीं हैं. उनका कहना है कि आज एक युवा अपने जगने के वक्त का आधे से अधिक हिस्सा स्क्रीन देखने में खर्च कर रहा है. जिस वजह से गहरी समझ, एकाग्रता और स्मृति पर असर पड़ रहा है. 

डॉक्टर ने आगे बताया कि इंसानी दिमाग सबसे अच्छा फेस-टू-फेस बातचीत, शिक्षकों, दोस्तो, माता-पिता और डीप स्टडीज से सीखता है. स्क्रीन टाइमिंग नेचुरल प्रोसेस को बाधित कर रही है. इसकी वजह खराब ऐप्स और प्रशिक्षण की कमी नहीं है बल्कि टेक्नोलॉजी और ह्यूमन माइंड के बीच खराब असंगति है. 

अब क्या करें

डॉ. होर्वाथ ने संसद में बताया कि 2010 के बाद स्कूलों में जैसे-जैसे डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा, वैसे-वैसे अकैडमिक प्रदर्शन स्थिर हो गई या फिर गिर गई. उनकी रिसर्च 80 से अधिक पर बेस्ड है. एक्सपर्ट्स इसे सामाजिक आपातकाल बता रहे हैं. उनका कहना है कि बच्चों को देर से स्मार्टफोन दिया जाए और स्कूलों में तकनीक को लिमिट किया जाए. 

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