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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से जुड़े एक कथित वायरल वीडियो के आधार पर कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया. अदालत ने न केवल याचिकाएं निरस्त कीं, बल्कि सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के रुख पर भी सवाल उठाए. पीठ ने साफ किया कि संवैधानिक ढांचे में उच्च न्यायालयों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और सीधे सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना न्यायिक प्रक्रिया की भावना के अनुरूप नहीं है.
पहले हाई कोर्ट क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान बेंच ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि उन्होंने पहले आपने गुवाहटी हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया? अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालयों को संविधान के तहत व्यापक अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें दरकिनार कर सीधे सुप्रीम कोर्ट आना उचित नहीं है.
पीठ ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को कमतर आंकने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए. न्यायिक अनुशासन और प्रक्रिया का पालन करना हर याचिकाकर्ता की जिम्मेदारी है.
न्यायिक व्यवस्था पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में संकेत दिया कि संवैधानिक ढांचा बहुस्तरीय है, जिसमें जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक स्पष्ट व्यवस्था निर्धारित है. यदि हर मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जाए, तो यह न केवल न्यायिक भार बढ़ाएगा बल्कि निचली अदालतों की भूमिका को भी कमजोर करेगा. अदालत की यह टिप्पणी व्यापक रूप से न्यायिक प्रणाली के संतुलन और अनुशासन की याद दिलाने के रूप में देखी जा रही है.
अब आगे क्या?
याचिकाओं के खारिज होने के बाद अब याचिकाकर्ताओं के पास संबंधित उच्च न्यायालय में जाने का विकल्प खुला है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल के तौर पर देखा जाएगा, जहां उचित मंच का चयन महत्वपूर्ण होता है.
इस आदेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान और सही मंच का चुनाव संवैधानिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है.
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