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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (ये इमेज है) Photograph: (GROK AI)
ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच चल रही जंग अब समंदर के उस रास्ते तक पहुंच गई है जिसे दुनिया की 'तेल की नस' कहा जाता है. ईरान की सेना (IRGC) ने आधिकारिक तौर पर एलान कर दिया है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अब अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके साथ देने वाले किसी भी देश के जहाजों के लिए बंद है. ईरान ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर इस रास्ते में इनका कोई भी जहाज दिखा, तो उसे फौरन निशाना बनाया जाएगा.
सिर्फ चीन को 'वीआईपी' ट्रीटमेंट क्यों?
इस पूरे तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा कूटनीतिक कार्ड खेला है. उसने कहा है कि इस रास्ते से सिर्फ चीन के झंडे वाले जहाजों को ही निकलने की इजाजत होगी. ईरान का कहना है कि यह चीन के लिए एक 'तोहफा' है क्योंकि जंग शुरू होने के बाद से ही बीजिंग ने तेहरान का साथ दिया है. इस फैसले ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है. एक तरफ चीन जिसे छूट मिली है, और दूसरी तरफ बाकी दुनिया जिसके लिए तेल का संकट खड़ा हो गया है.
दुनिया के तेल की नस पर कब्जा
हॉर्मुज की खाड़ी कितनी अहम है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, इराक और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादक देश इसी रास्ते से अपना तेल दुनिया भर में भेजते हैं. समंदर में इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है जिससे ये देश अपना माल बाहर भेज सकें. ईरान का कहना है कि जंग के दौरान उसे अपने इलाके के रास्ते को कंट्रोल करने का पूरा हक है, हालांकि दुनिया के बाकी देश इसे गलत मान रहे हैं.
क्या है ईरान की जिद्द?
इंटरनेशनल कानून (UNCLOS) के मुताबिक, हॉर्मुज की खाड़ी एक ऐसा रास्ता है जिससे किसी भी देश का जहाज, यहां तक कि युद्धपोत भी बिना रोक-टोक के निकल सकता है. लेकिन ईरान इस कानून को नहीं मानता. उसका कहना है कि उसके देश का कानून अंतरराष्ट्रीय नियमों से ऊपर है. इस जिद की वजह से अब समंदर में टकराव की स्थिति पैदा हो गई है. अगर अमेरिकी या यूरोपीय जहाज यहां से निकलने की कोशिश करते हैं, तो सीधी जंग शुरू हो सकती ह.
भारत के लिए खतरे की घंटी
ईरान के इस फैसले ने भारत की धड़कनें बढ़ा दी हैं. भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल दूसरे देशों से खरीदता है और इसका एक बड़ा हिस्सा इसी खाड़ी के रास्ते आता है. अगर हॉर्मुज का रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की किल्लत हो सकती है और उनकी कीमत (Price) बहुत ज्यादा बढ़ सकती है. भारत के लिए यह मामला सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने का भी है.
जयशंकर का एक्शन और डिप्लोमेसी
हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मोर्चा संभाल लिया है. उन्होंने पिछले कुछ दिनों में दूसरी बार ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से बात की है. भारत कोशिश कर रहा है कि बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकाला जाए ताकि तेल की सप्लाई न रुके. भारत की डिप्लोमेसी इस समय इसी बात पर टिकी है कि ईरान के साथ दोस्ती भी बनी रहे और हमारे जहाजों को भी सुरक्षित रास्ता मिल सके.
सऊदी और पड़ोसी देशों की टेंशन
ईरान के इस एलान ने सिर्फ पश्चिमी देशों को ही नहीं, बल्कि उसके पड़ोसी देशों सऊदी अरब और कुवैत को भी मुश्किल में डाल दिया है. इन देशों की पूरी कमाई तेल बेचने से होती है. अगर रास्ता बंद रहता है, तो इनके पास तेल तो होगा लेकिन उसे खरीदने वाला कोई नहीं पहुंच पाएगा. फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका और उसके साथी देश इस रास्ते को बलपूर्वक (Forcefully) खोलने की कोशिश करेंगे या फिर बातचीत से बात बनेगी.
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