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निर्भया बलात्कार के बाद भी नहीं बदले हालात, अभी भी 'रेप कैपिटल' है दिल्ली

2012 के दिसंबर महीने में दिल्ली में निर्भया बलात्कार कांड के बाद दोषियों के खिलाफ सजा देने के लिए देश में हुए आंदोलन ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर विमर्श की नई जमीन तैयार की।

By : Abhishek Parashar | Updated on: 04 May 2017, 11:21:33 PM
निर्भया मामले में सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला (फाइल फोटो)

highlights

  • वर्मा समिति ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए ''सरकार की विफलता'' को जिम्मेदार बताया था
  • एनसीआरीब के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में अपराध की दर 53.9 फीसदी रही
  • वहीं दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध की दर 184.3 फीसदी रही जो कि राष्ट्रीय दर 56.3 से तीन गुने से भी अधिक है

New Delhi:

2012 के दिसंबर महीने में दिल्ली में निर्भया बलात्कार कांड के बाद दोषियों के खिलाफ सजा देने के लिए देश में हुए आंदोलन ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर विमर्श की नई जमीन तैयार की।

निर्भया बलात्कार कांड के बाद हुए आंदोलन और विरोध प्रदर्शन के दबाव की वजह से सरकार को महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकने के लिए बने कानून की समीक्षा के लिए दिवंगत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जे एस वर्मा की अध्यक्षता में समिति का गठन करना पड़ा।

वर्मा समिति ने हालांकि दबावों को दरकिनाकर करते हुए बलात्कार के लिए मौत की सजा की सिफारिश नहीं की लेकिन उन्होंने इसके लिए सश्रम कारावास या आजीवन कारावास की सजा की सिफारिश की, जिसे सरकार ने मान लिया।

और पढ़ें: निर्भया मामले में कल सजा सुनाएगा सुप्रीम कोर्ट, निचली अदालत सुना चुकी है आरोपियों को फांसी की सजा

वहीं गैंग रेप के मामले में समिति ने कम से कम 20 साल की सजा दिए जाने की सिफारिश की थी। इसके अलावा अन्य तरह के यौन उत्पीड़न के लिए समिति ने सात साल के जेल की सजा की सिफारिश की थी।

वर्मा समिति ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए ''सरकार की विफलता'' को जिम्मेदार बताया था।

समिति ने सरकार, पुलिस और यहां तक कि आम जनता की निष्क्रियता को बलात्कार जैसे अपराध के लिए जिम्मेदार मानते हुए सीआरपीसी में संशोधन, महिलाओं के अधिकार के लिए बिल लाने, अफ्स्पा में संशोधन, पुलिस सुधार और राजनीतिक सुधार की वकालत की थी।

गुजरते समय के साथ वर्मा समिति की सिफारिशें अब भुलाई जा चुकी है। 2012 के बाद से देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध विशेषकर बलात्कार के आंकड़े यह बताने के लिए काफी है कि बेशक लोकसभा और राज्यों (विशेषकर) में यह राजनीति मुद्दा बना लेकिन अभी भी सरकार उन सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाने में विफल रही है, जिसे वर्मा समिति ने सुझाया था।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) 2014 के मुकाबले 2015 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी तरह के अपराध और बलात्कार के मामलों में कमी आई हो, लेकिन 2012-15 के दौरान बलात्कार के मामले में लगातार बढ़ोतरी देखी गई।

एनसीआरबी के मुताबिक 2012 में जहां देश में कुल 24, 923 मामले दर्ज किए गए, वहीं 2013 में 33,707 औप 2014 में 36,735 मामले दर्ज किए गए। 

लेकिन 2015 में देश में बलात्कार के मामलों में 5.7 फीसदी की कमी आई और यह कम होकर 34,651 हो गया।

2011-14 के बीच देश में बलात्कार के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई। 2010 के मुकाबले 2011 में बलात्कार के मामलों में 9.2 फीसदी जबकि 2011 के मुकाबले 2012 में बलात्कार के मामलों में 3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

2012 के मुकाबले 2013 में 35.2 फीसदी की जबकि 2013 के मुकाबले 2014 में 9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। लेकिन 2014 के मुकाबले 2015 में देश में बलात्कार के मामलों में 5.7 फीसदी की गिरावट आई।

दिल्ली में नहीं सुधरे हालात

बेशक 2015 में 2014 के मुकाबले देश में बलात्कार के मामलों में कमी आई हो लेकिन दिल्ली में महिलाएं पहले की ही तरह असुरक्षित हैं। आंकड़े और अपराध की दर दिल्ली के ''कैपिटल'' होने की पुष्टि करते हैं।

एनसीआरीब के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में अपराध की दर 53.9 फीसदी रही। वहीं दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध की दर 184.3 फीसदी रही जो कि राष्ट्रीय दर 56.3 से तीन गुने से भी अधिक है।

दूसरे नंबर पर असम (148.2), तीसरे नंबर पर तेलंगाना (83.1), चौथे नंबर पर ओडिशा (81.9), पांचवें नंबर पर राजस्थान (81.5), छठे नंबर पर हरियाणा (75.7) और सातवें नंबर पर बंगाल (73.4 फीसदी) रहा।

एनसीआरबी 2015 के आंकड़े साफ बताते हैं कि निर्भया कांड के बाद वर्मा समिति ने जिस पुलिस और राजनीतिक सुधार की बात की थी, वह आज भी अधूरा पड़ा हुआ है।

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First Published : 04 May 2017, 10:11:00 PM

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