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शालू मंदिर में हान व तिब्बती जातीय कला की तलाश

शालू मंदिर में हान व तिब्बती जातीय कला की तलाश

IANS | Edited By : IANS | Updated on: 29 Sep 2021, 07:55:01 PM
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(source : IANS) (Photo Credit: (source : IANS))

बीजिंग: शालू मंदिर तिब्बत के शिकात्से शहर में स्थित है। यह मंदिर इसलिये प्रसिद्ध है, क्योंकि यहां की इमारतों में चीन के युआन राजवंश में हान व तिब्बती दोनों जातियों की शैलियां शामिल हुई हैं। साथ ही इसमें 11वीं से 14वीं शताब्दी तक बनाये गये भित्ति चित्र भी बहुत आकर्षक हैं। वर्ष 1996 में शालू मंदिर को राष्ट्रीय प्रमुख सांस्कृतिक अवशेष माना गया। इस मंदिर से यह जाहिर हुआ है कि चीन के युआन राजवंश में केंद्र सरकार ने तिब्बत का कारगर शासन व प्रबंध शुरू किया। देश की एकता और जातीय आदान-प्रदान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में यह मंदिर वास्तुकला और चित्रकला के क्षेत्र में हान जाति और तिब्बती जाति के बीच आदान-प्रदान व एकीकरण का प्रतीक बन गया।

गौरतलब है कि शालू मंदिर की स्थापना 11वीं शताब्दी के आरंभ में जित्सन शेरब ़ख्युंगने द्वारा की गयी। मंदिर के मामले ग्ये परिवार संभालता था। 13वीं शताब्दी में ग्ये परिवार को युआन राजवंश की केंद्रीय सरकार से बहुत धनराशि व अच्छा व्यवहार मिला। इसलिये उन्होंने बड़े पैमाने पर शालू मंदिर का विस्तार किया, और प्रसिद्ध विद्वान को आमंत्रित कर इस मंदिर का मेजबान बनाया। उसी समय शालू मंदिर शिकात्से क्षेत्र में एक धार्मिक व सांस्कृतिक केंद्र बना।

11वीं शताब्दी में शालू मंदिर में केवल चार बुद्ध हॉल थे। फिर 13वीं शताब्दी के अंत से 14वीं शताब्दी के अंत तक चार बार विस्तार कर इमारतों का पैमाना धीरे-धीरे बड़ा हो गया। जो प्रमुख इमारतें, अतिरिक्त इमारतें तथा आवासीय क्षेत्र समेत एक इमारत समूह बन गया। जिसका कुल क्षेत्रफल 95 हजार वर्ग मीटर तक पहुंचा। प्रमुख इमारतों में स्थित मुख्य हॉल में लोग हान जाति और तिब्बती जाति की मिश्रित वास्तुकला देख सकते हैं।

इसके अलावा शालू मंदिर के भित्ति चित्र भी बहुत सुन्दर हैं। यहां के भित्ति चित्र न सिर्फ़ रंगारंग हैं, बल्कि चित्रों के विषय भी बहुत समृद्ध हैं। साथ ही सभी चित्र बहुत अच्छी तरह से संरक्षित हैं। उन भित्ति चित्रों से यह देखा जा सकता है कि तिब्बती कला में विभिन्न संस्कृतियां व विभिन्न कलाएं शामिल हुई हैं। और वह युआन राजवंश में हान जाति व तिब्बती जाति के बीच कला व संस्कृति के आदान-प्रदान का एक ऐतिहासिक द्योतक भी है।

(चंद्रिमा - चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

First Published : 29 Sep 2021, 07:55:01 PM

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