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जमीयत उलमा-ए-हिंद ने नई शिक्षा नीति को खारिज किया, कहा- हिंदू धर्म के तरीकों को थोपा जा रहा

जमीयत उलमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का महत्वपूर्ण सम्मेलन संगठन के अध्यक्ष मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी की अध्यक्षता में रविवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई.

IANS | Updated on: 25 Oct 2020, 09:58:41 PM
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जमीयत उलमा-ए-हिंद ने नई शिक्षा नीति को खारिज किया, कही ये बात (Photo Credit: File Photo)

नई दिल्ली:

जमीयत उलमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का महत्वपूर्ण सम्मेलन संगठन के अध्यक्ष मौलाना कारी सैयद मोहम्मद उस्मान मंसूरपुरी की अध्यक्षता में रविवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई. सम्मेलन में विशेषकर नई शिक्षा नीति, इस्लामी मदरसों के खिलाफ नकारात्मक प्रचार, मदरसों में आधुनिक शिक्षा के लिए व्यावहारिक कार्यक्रम की तैयारी और सोशल मीडिया में इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ 'जहर उगले जाने' जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ.

पिछली कार्यवाही की जानकारी देने के बाद संगठन के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने देश के मौजूदा हालात, विशेषकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा का सीएए को लागू करने संबंधी बयान और इसी तरह असम सरकार की तरफ से सहायता प्राप्त मदरसों में धार्मिक शिक्षा की पाबंदी जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर विस्तार से प्रकाश डाला. राष्ट्रीय साधारण कार्यकारिणी ने सांप्रदायिक भेदभाव पर आधारित कार्यो की तीव्र निंदा करते हुए इसके प्रभावों पर गौर किया.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी में खासतौर से नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विषय विचारणीय रहा. इससे संबंधित एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें इसको हिंदू धर्म और उसके तरीके को सारे नागरिकों पर जबरन थोपने वाला कदम बताया गया. प्रस्ताव में कहा गया है कि "हमारे देश में वैचारिक और व्यावहारिक दोनों स्तर पर धार्मिक भेदभावपूर्ण और परंपरागत सेकुलर व्यवस्था के बीच कश्मकश इस वक्त अत्यधिक चरम सीमा पर है. हिंदू राष्ट्र समर्थित दृष्टिकोण ने राजनीतिक सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद अपने पुराने एजेंडे को एक-एक करके लगभग हर क्षेत्र में लागू करना शुरू कर दिया है. इस संबंध की महत्वपूर्ण कड़ी नई शिक्षा नीति है."

प्रस्ताव में आगे कहा गया कि देश में आमतौर पर शिक्षा स्तर को सुधारने और उद्योग धंधों, आर्थिक तरक्की के लिए शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कुछ लाभप्रद और सकारात्मक कदमों के बावजूद धार्मिक भेदभाव की छाप इस पर इस कदर प्रभावी हुई है कि कमियों की निशानदेही में एतदाल मुश्किल हो गया है. सभ्यता व संस्कृति, राष्ट्रीयता, शारीरिक व मानसिक और स्वास्थ्य एवं एकता और समानता आदि के नाम पर नई शिक्षा नीति में ऐसे परिवर्तन किए गए हैं, जिसका मूलभूत निशाना हिंदू धर्म और उसके तौर-तरीके को जीवन के हर क्षेत्र में समस्त नागरिकों पर जबरन थोपना है.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने अपने प्रस्ताव में मुसलमानों से अपील की है कि "जमीयत उलमा-ए-हिंद की पारंपरिक पुरानी कोशिशों पर गंभीरता से अमल करते हुए ज्यादा से ज्यादा अपने स्कूल स्थापित करें, जहां इस्लामी वातावरण में आधुनिक शिक्षा उपलब्ध की जाए."

First Published : 25 Oct 2020, 09:58:41 PM

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