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CHANDRAYAAN 2 : आसान नहीं रहा इंसान का चांद तक का सफर, मक्खी से लेकर बंदर तक कई ने गवाई जान

चंद्रयान 2 का रॉकेट GSLV MK-3 दोपहर 2:43 मिनट पर श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रवाना हुआ.

News Nation Bureau | Edited By : Yogesh Bhadauriya | Updated on: 23 Jul 2019, 02:26:53 PM
वैज्ञानिक नहीं लेना चाहते थे कोई खतरा

वैज्ञानिक नहीं लेना चाहते थे कोई खतरा

New Delhi:

इस साल 2019 के जुलाई माह की 22 तारीख के रविवार का दिन देश के लिए बेहद खास रहा. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-2 लॉन्च कर इतिहास रच दिया. चंद्रयान 2 का रॉकेट GSLV MK-3 दोपहर 2:43 मिनट पर श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रवाना हुआ. फिलहाल रॉकेट ने चंद्रयान-2 को अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंचा दिया है..लेकिन क्या आपको मालूम है कि विज्ञान कैसे और कितने परिक्षणों के बाद इस चरण तक पहुंच सका है. हालांकि चंद्रयान में कोई भी इंसान मौजूद नहीं था, उसमें पेलोड थे. लेकिन आईए आज आपको उन ऐतिहासिक तस्वीरों की मद्द से बताते हैं कि कैसे उन तमाम वैज्ञानिकों की महनत और इच्छा शक्ति के सहारे विज्ञान यहां तक पहुंचा है.

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आसान नहीं रही इंसान की चांद तक की उड़ान, इन जीवों को गवानी पड़ी जान

अंतरिक्ष की पहली उड़ान
1947 में सोवियत संघ ने पहली बार जीव को अंतरिक्ष में भेजा. वह एक मक्खी थी. दस साल बाद 1957 में सोवियत संघ ने एक कुतिया(फीमेल डॉग) को अंतरिक्ष में भेजा. लेकिन रॉकेट लॉन्च के कुछ घंटों बाद लाइका मर गयी.


पहली सफलता
लाइका की मौत के बावजूद सोवियत संघ ने कुत्तों को अंतरिक्ष भेजना जारी रखा. धीरे धीरे रॉकेटों को ज्यादा सुरक्षित बनाया जाने लगा. 1960 में स्ट्रेल्का और बेल्का नाम के कुत्तों को अंतरिक्ष में वापस भेजा गया. दोनों सुरक्षित वापस लौटे. 1961 में स्ट्रेल्का का एक बच्चा तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी को भेंट भी किया गया.


फिर आई बंदर की बारी
रूस जहां कुत्तों को अंतरिक्ष में भेज रहा था, वहीं अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा बंदरों के भरोसे तैयारियां कर रही थी. 1958 में अमेरिका ने गोर्डो नाम के बंदर को अंतरिक्ष में भेजा लेकिन उसकी मौत हो गयी. साल भर बाद 1959 में मिस बेकर और एबल नाम के बंदरों को भेजा गया. दोनों सुरक्षित वापस लौटे.

बंदरों पर असर
एबल और मिस बेकर पृथ्वी की कक्षा से जिंदा वापस लौटने वाले पहले बंदर थे. 500 किलोमीटर ऊपर भारहीनता ने बंदरों की हालत खस्ता कर दी थी. लैंडिंग के कुछ ही देर बाद एबल की मौत हो गयी. मिस बेकर 1984 में 27 साल की उम्र पूरी करके विदा हुई.

कैप्सूल का प्रयोग
सैम भाग्यशाली रहा कि उस पर मिस बेकर और एबल की तरह भारहीनता के प्रयोग नहीं किये गए. सैम नाम के बंदर के जरिये अंतरिक्ष यात्रियों को जिंदा रखने वाले कैप्सूल का टेस्ट हुआ. सैम इस टेस्ट में कामयाब रहा.

अंतरिक्ष में पहला चिम्पांजी
कुत्ते और बंदरों के बाद इंसान के बेहद करीब माने जाने वाले चिम्पांजी की अंतरिक्ष यात्रा का नंबर आया. 1961 में अमेरिका ने हैम नाम के चिम्पाजी को अंतरिक्ष में भेजा. उसने छह मिनट तक भारहीनता का सामना किया. वह जिंदा वापस लौटा. उसके शरीर का अध्ययन कर भारहीनता में शरीर कैसे काम करता है, यह समझने में मदद मिली.

छोटे पर टफ जीव
कुत्तों, बंदरों और चिम्पांजी को अंतरिक्ष में भेजने के बाद इंसान भी अंतरिक्ष में गया. लेकिन ऐसा नहीं है कि अब दूसरे जीवों को अंतरिक्ष में भेजने का काम बंद हो गया है. यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने 2007 में टार्डीग्रेड नाम के सूक्ष्म जीवों को अंतरिक्ष में भेजा. वे 12 दिन जीवित रहे. उनकी मदद से पता किया जा रहा है कि निर्वात और सौर विकिरण जीवन पर कैसा असर डालता है.

First Published : 23 Jul 2019, 09:57:50 AM

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