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देश की बहस में आज दीपक चौरसिया के साथ देखें यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो, तो किसे दिक्कत?

देश की बहस में आज दीपक चौरसिया के साथ देखें यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो, तो किसे दिक्कत?

News Nation Bureau | Edited By : Ravindra Singh | Updated on: 24 Nov 2020, 11:49:46 PM
desh ki bahas

देश की बहस में दीपक चौरसिया (Photo Credit: न्यूज नेशन)

नई दिल्ली:

देश की बहस में आज दीपक चौरसिया के साथ देखें यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो, तो किसे दिक्कत? इस मुद्दे पर टीवी डिबेट शो मेहमानों के साथ इस डिबेट शो में हम बात करेंगे कि इस कोड के लागू होने से किस पर असर पड़ेगा. आइए आपको बताएं इस डिबेट में किसने क्या कहा.

इस्‍लाम को मानने वाले देशों में कोरोना वैक्‍सीन क्‍यों नहीं बन रही : सुधांशु त्रिवेदी
शरिया कानून लागू करने की बात पर बीजेपी प्रवक्‍ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, इस्‍लाम को मानने वाले देशों में कोरोना वैक्‍सीन क्‍यों नहीं बन रही. कोरोना वैक्‍सीन या तो अमेरिका बनाएगा या रूस या यूरोप या भारत या फिर इजरायल. अमेरिका को इस्‍लाम वाले दुश्‍मन मानते हैं. रूस खुलेआम इस्‍लाम का विरोध करता है, फ्रांस के नाम पर यूरोप का ये लोग बहिष्‍कार करेंगे, इजरायल तो दुश्‍मन है ही. अब इस्‍लाम को मानने वाले बताएं कि कोरोना वैक्‍सीन लेंगे या नहीं लेंगे. 56 मुस्‍लिम देशों में से किसी ने कोरोना वैक्‍सीन बनाने की हिम्‍मत नहीं की, जबकि मुस्‍लिम देशों में बहुत पैसा है. यह सब इसी जाहिलियत का नतीजा है.

समान नागरिक संहिता पर सभी धर्मों के लोगों से राय लीजिए, मुस्‍लिमों के लिए नफरत न फैलाइए : मौलाना साजिद रशीदी
इन मुद्दों पर मौलाना साजिद रशीदी ने कहा, पहले जेएनयू से राय ले लीजिए, अन्य धर्मों से राय ले लीजिए फिर आगे बात करिए. आप मुसलमानों को बार-बार क्यों ले आते हैं अपनी डिबेट में. आप बार-बार मुसलमान का नाम लेकर नफरत मत फैलाइए. पहले जितने भी धर्म हैं इस लॉ के समर्थन में, उनकी भी एक बार राय ले लीजिए. पार्लियामेंट में विपक्ष की कोई भूमिका होती है.

समान नागरिक संहिता पर कानून बन जाएगा तो कोई माने या न माने, क्‍या फर्क पड़ता है : सुधांशु त्रिवेदी
इन मुद्दों पर बीजेपी प्रवक्‍ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून होना चाहिए. यहां पर किसी को दिक्कत नहीं है लेकिन इस्लाम को ही क्यों दिक्कत होती है. आप बाकी कानूनों में तो सरिया की बात करते हैं लेकिन जब क्रिमिनल में इनसे बात की जाती है तो संविधान की बात करते हैं. आपको यहां पर भी सरिया कानून को मानना चाहिए जैसे कि अगर किसी और धर्म का कोई व्यक्ति चोरी करता है तो उसे 2 महीने की सजा होगी और आपके यहां उसके हाथ काट दिए जाएंगे. जब पार्लियामेंट कानून पारित ही कर देगा तो किसी के मानने न मानने से फर्क थोड़ी ही पड़ता है. आज तक मुसलमानों की सबसे बड़ी रैली कब हुई दिल्ली में, आपको मालूम है? वो तारीख थी 20 अप्रैल 1987. जब भारत की वर्तमान न्याय व्यवस्था नहीं थी तो पंचायती व्यवस्था में ठाकुरों का दबदबा था. वैसे ही कॉमन सिविल कोड लागू होने के बाद मौलवियों के पास और काजियों के पास जाएगा कौन?

देश में सरिया कानून लागू कर दीजिए, रेप अपने आप कम हो जाएगा : माजिद हैदरी
माजिद हैदरी ने कहा, मैं बाबा साहेब से प्रेम करता हूं और सुधांशु त्रिवेदी की बहुत इज्जत करता हूं. आपको बता दूं कि देश में हर 20 मिनट पर एक रेप होता है. अगर आप देश में सरिया कानून लागू कर दें तो ये आंकड़ा बिलकुल कम न हो जाए तो कहिएगा.

भारत में शरिया कानून की बात कर मौलाना साहब आज एक्‍सपोज हो गए : आश्‍विनी उपाध्‍याय
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ वकील आश्‍विनी उपाध्‍याय ने कहा, मौलाना साहब आज एक्सपोज हो गए. ये कह रहे हैं कि भारत में सरिया कानून लाया जाना चाहिए. अंदरखाने हर शुक्रवार को यही तकरीर की जाती है. हम पांच, हमारे 45 और उनके हाथ में एके- 47. ये संविधान की आत्मा है. ऑर्टिकल 44 जब तक लागू नहीं किया जाता है, तब तक देश को धर्मनिरपेक्ष कहा जाना बेइमानी होगी. मान लीजिए 4 बहने हैं तो उनके फंडामेंटल राइट्स बराबर हैं लेकिन अगर वो चारों अलग-अलग धर्मों में विवाह करती हैं तो उनके बीच डिवाइडेशन अलग तरीके से होगा. ऐसे में यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत है.

यूनिफॉर्म सिविल कोड से कुछ लोगों को डर लगता है : देवेश मिश्रा
देश की बहस के दर्शक देवेश मिश्रा ने कहा, यूनिफॉर्म सिविल कोड से कुछ लोगों को डर लगता है. यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब ही है एक निष्पक्ष कानून.

शरिया कानून सिर्फ महिलाओं और बच्चों को दबाने का कानून है : अंबर जैदी
यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अंबर जैदी ने कहा, शादी की उम्र के लिए दूसरे धर्मों के महिलाओं की 18 साल होनी चाहिए जबकि पर्सनल लॉ में लड़कियों की कोई उम्र नहीं है शादी की. इस्लाम में बहुविवाह की बात करें तो आपको बता दें कि शरिया कानून सिर्फ महिलाओं और बच्चों को दबाने का कानून है. इस्लाम धर्म महिलाओं के लिए ही शरिया कानून का हवाला देता है. बाकी क्राइम के लिए वो सिविल कोर्ट का रुख करते हैं. ब्रिटिश काल के कानून जब देश में आज भी फॉलो करते हैं तो हम क्यों लकीर के फकीर बने हुए हैं.

70 सालों में सरकारें यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की हिम्‍मत क्‍यों नहीं कर पाईं : अतीकुर्रहमान
यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर इस्‍लामिक स्‍कॉलर अतीकुर्रहमान ने कहा, हमारे समाज और देश में बहुत सारी समस्याएं हैं कुछ धार्मिक हैं तो कुछ अन्य बातों को लेकर हैं. आखिर यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने को लेकर पिछले 70 सालों में कोई सरकार इसकी हिम्मत क्‍यों नहीं कर पाई. बीजेपी सत्ता में आई, तभी से इसकी चर्चा चल रही है. कांग्रेस ने मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया.

बाबा साहेब की फोटो लगाकर बैठने वालों को यूनिफॉर्म सिविल कोड का स्‍वागत करना चाहिए : अवनिजेश अवस्‍थी
यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर राजनीतिक विश्‍लेषक अवनिजेश अवस्‍थी ने कहा, जो लोग देश में सबसे ज्यादा इनटॉलरेंस का बहाना बनाते थे वो सबसे पहले अंबर जैदी को बिना सुने भागने लगे. जब वो दुनिया के सामने टीवी डिबेट शो के दौरान ऐसा कर रहे हैं तब वो घरों में महिलाओं के साथ क्या करते होंगे. आज वो कहते हैं कि कांग्रेस ने हमें वोट बैंक समझा, हम जहां पड़े हैं वहां पड़े रहने दो. जो लोग बाबा साहेब की फोटो लगाकर बैठे रहते हैं, उन्हें सबसे पहले आगे आकर इसका स्वागत करना चाहिए.

संविधान के हिसाब से सभी समान हैं तो समान नागरिक कानून लागू होना चाहिए : ऋतु पांडेय
यूनिफॉर्म सिविल कोड पर दर्शक ऋतु पांडेय ने कहा, अगर संविधान के हिसाब से सभी नागरिक समान हैं तो समान नागरिक कानून लागू होना चाहिए. इस कानून के मुताबिक पहले देश को इसके बारे में बताना चाहिए ताकि देश के लोगों को इसके बारे में जानकारी हो सके.

मोदी सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड पर राज्‍य सरकारों को मना पाएगी : तिलकराज मिश्रा
यूनिफॉर्म सिविल कोड पर दर्शक तिलकराज मिश्रा ने कहा, जब देश में आजादी के साथ बंटवारा हुआ तब पूर्ववर्ती सरकारों ने इस कानून पर ध्यान नहीं दिया. एनडीए की सरकार ने इस पर ध्यान दिया है लेकिन क्या राज्य सरकारें भी इसे फॉलो करेंगी.

बीजेपी संविधान को लागू करना चाहती है, पाकिस्‍तान परस्‍तों को इसमें खोट दिखता है : प्रेम शुक्‍ला
संविधान सभा ने जिस तरह का संविधान हमें दिया है, बीजेपी उसे लागू करना चाहती है. जो पाकिस्‍तान परस्‍त हैं, उन्‍हें इसमें खोट दिखता है और उन्‍हें पीड़ा होती है. अतीकुर्रहमान के पास तर्क नहीं था तो वे बहस छोड़कर चले गए. मौलाना साजिद रशीदी के पास भी कोई तर्क नहीं है. वे इमामत की बात तो करते हैं, लेकिन इस्‍लाम के अनुसार किसी झूठे व्‍यक्‍ति को इमामत का हक नही मिलना चाहिए.

First Published : 24 Nov 2020, 08:29:42 PM

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