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हिंदी दिवस विशेष: हिंदी और इसका विरोध

साल 1946 । हिंदुस्तान आजादी के मुहाने पर खड़ा था। आजादी के पक्षधर भारत के स्वर्णिम युग की नींव रखने के लिए विचार-विमर्श कर रहे थे। इसी के साथ देश में भाषा के आधार पर राज्यों के बंटवारे की मांग भी तेज होने लगी। हिंदी प्रेमियों ने इसे हिंदी का विरोध माना तो गैर हिंदी भाषियों ने इसे अपनी अस्मिता से जोड़ा।

Jeevan Prakash | Edited By : Jeevan Prakash | Updated on: 14 Sep 2016, 12:48:49 PM
हिंदी और इसका विरोध

नई दिल्ली:

साल 1946 । हिंदुस्तान आजादी के मुहाने पर खड़ा था। आजादी के पक्षधर भारत के स्वर्णिम युग की नींव रखने के लिए विचार-विमर्श कर रहे थे। तभी धर्म, जाति और भाषा को लेकर अपनी-अपनी मांगें उठने लगी। आजादी के साथ धर्म के आधार पर भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। इसी के साथ देश में भाषा के आधार पर राज्यों के बंटवारे की मांग भी तेज होने लगी। हिंदी प्रेमियों ने इसे हिंदी का विरोध माना तो गैर हिंदी भाषियों ने इसे अपनी अस्मिता से जोड़ा। संविधान सभा को लिखे चिट्ठी में 'भाषायी अल्पसंख्यकों' ने मांग की 'उनकी मातृभाषा में उनको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जाए और भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया जाए।'

300 साल के फिरंगियों के राज में अंग्रेजी प्रमुख भाषा बनकर उभरी थी। प्रशासनिक स्तर पर अंग्रेजी में काम हो रहा था। आजादी मिलने के साथ-साथ उत्तर भारत के प्रतिनिधि हिंदी के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे तो दक्षिण भारत के नेता हिंदी के बदले बड़े स्तर पर संवाद के लिए अंग्रेजी को जरूरी बता रहे थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेजी के बदले हिंदुस्तानी को बीच का रास्ता माना। जो हिंदी और उर्दू का मिश्रण था। जिसे दक्षिण भारतीयों ने नामंजूर कर दिया। तब चेन्नई (मद्रास) से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व कर रहे टीटी कृष्णामाचारी ने कहा था-

'मैं दक्षिण भारतीय लोगों की तरफ से चेतावनी देना चाहता हूं कि, दक्षिण में अभी भी ऐसे तत्व हैं जो अलगाव की ख्वाहिश रखते हैं और इस काम में संयुक्त प्रांत के मेरे माननीय दोस्त अपने हिंदी साम्राज्यवाद के विचार से कोई मदद नहीं कर पाएंगे। महाशय, अब यह यूपी के मेरे दोस्त के ऊपर है कि वह पूरा हिंदुस्तान चाहते हैं या सिर्फ हिंदी भाषी हिंदुस्तान। यह चुनाव बिल्कुल उनका है....'। कृष्णामाचारी बाद में केंद्र सरकार में वित्त मंत्री बने।

ऐसा नहीं है कि हिंदी के विरोध में आजादी के बाद ही आवाजें उठी। सन् 1937 में जब सी. राजगोपालाचारी मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने स्कूलों में हिंदी भाषा की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया, जिससे हिंदी विरोधी आन्दोलन उग्र हो गया। तब पेरियार ने हिंदी-विरोधी आंदोलनों का आयोजन किया। पेरियार ने हिंदी के विरोध में ‘तमिल नाडु तमिलों के लिए’ का नारा दिया। उनका मानना था कि हिंदी लागू होने से तमिल संस्कृति नष्ट हो जाएगी और तमिल समुदाय उत्तर भारतीयों के अधीन हो जायेगा।

लोगों के मन में अपनी भाषा के लिए अभिमान हो, यह स्वभाविक है। ऐसे में भाषा के आधार पर राज्यों के बंटवारे की मांग पर विचार के लिए संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज एसके धर की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय आयोग की नियुक्ति की। 17 जून 1948 को गठित इस आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन का विरोध किया और प्रशासनिक सुविधा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया। जिसे दक्षिण भारत खासकर मद्रास प्रांत के लोगों ने स्वीकार नहीं किया।

राज्य की मांग को लेकर तेलगु भाषी पोटी श्री रामुल्लू के नेतृत्व में आंदोलन प्रारम्भ हुआ। 56 दिन के आमरण अनशन के बाद 15 दिसंबर, 1952 को रामुल्लू की मौत हो गई। जिसके बाद प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने तेलगु भाषियों के लिए अलग मद्रास से अलग आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा कर दी। यह स्वतंत्र भारत में भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य था। इसी के साथ हिंदी या उसी का बदला स्वरूप हिंदुस्तानी भाषा को स्वीकार करने और न करने को लेकर बहस भी कमजोर होने लगी।

मद्रास के बंटवारे के बाद अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा, भाषायी प्रेम, क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर लोग अलग-अलग राज्यों की मांग करने लगे। 1960 में बंबई राज्य को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए। 1966 में पंजाब का बंटवारा हुआ और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश दो नए राज्यों का गठन हुआ। इन बंटवारों में क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की मांग 'उत्प्रेरक' बना। जहां हिंदी कमजोर होती चली गई।

First Published : 14 Sep 2016, 06:15:00 PM

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