कोर्ट ने बताया था महज जमीन विवाद, जानें क्या है इस्माइल फारूकी जजमेंट

5 दिसंबर 2017 को जब अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी तब कोर्ट ने इसे महज जमीन विवाद बताया था.

5 दिसंबर 2017 को जब अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी तब कोर्ट ने इसे महज जमीन विवाद बताया था.

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abhiranjan kumar
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कोर्ट ने बताया था महज जमीन विवाद, जानें क्या है इस्माइल फारूकी जजमेंट

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

अयोध्या विवाद मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को अहम फैसला सुनाएगा. अयोध्या विवाद को लेकर मालिकाना हक पर सुप्रीम कोर्ट के 1994 के फैसले पर बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की मांग करने वाली मुस्लिम समूह की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी. कोर्ट अपने फैसले में बताएगा कि 1994 के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है या नहीं? दरअसल 1994 के फैसले में कहा गया था कि मस्जिद में नमाज इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है.

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क्या है इस्माइल फारूकी जजमेंट

5 दिसंबर 2017 को जब अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी तब कोर्ट ने इसे महज जमीन विवाद बताया था. हालांकि इस दौरान मुस्लिम पक्षकार की ओर से पेश वकील राजीव धवन ने कहा कि नमाज पढ़ने का अधिकार है और उसे बहाल किया जाना चाहिए.

धवन ने कोर्ट में दलील दी थी कि नमाज अदा करना धार्मिक प्रैक्टिस है और इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. ये इस्लाम का अभिन्न अंग है. क्या मुस्लिम के लिए मस्जिद में नमाज पढ़ना जरूरी नहीं है?

धवन ने दलील दी थी कि सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में दिए फैसले में कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है. इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला 1994 के जजमेंट के आलोक में था और 1994 के संवैधानिक बेंच के फैसले को आधार बनाते हुए फैसला दिया था जबकि नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग है और जरूरी धार्मिक गतिविधि है और ये इस्लाम का अभिन्न अंग है.

इसी मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी फैसला सुरक्षित किया है. संवैधानिक बेंच के सामने मामला जाएगा या नहीं उस फैसले के बाद ही जमीन विवाद मामले की सुनवाई शुरू होगी.

कोर्ट का फैसला पक्ष में आया तो?

अगर कोर्ट बड़े संवैधानिक बेंच को भेजना का फैसला करती है तो अयोध्या विवाद का केस टल जाएगा. अगर कोर्ट फैसला देता है कि इस्माइल फारुकी केस पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है तो अयोध्या मामले की सुनवाई जारी रहेगी.

कोर्ट का फैसला मुस्लिम संगठनों के पक्ष में आता है तो यह हिंदू पक्षकारों के लिए झटका की तरह होगा. वहीं सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसले को बररकार रखेगी तो यह मुस्लिम पक्षकारों के लिए मुश्किल मसला होगा.

Source : News Nation Bureau

Supreme Court Ayodhya Case namaz in mosque
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