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अनकवर्ड विद मनोज गैरोला Photograph: (News Nation)
28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया और ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत की पुष्टि हुई, तो दुनिया को लगा कि अब ईरान का इस्लामी शासन ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो खुलेआम ईरान में सत्ता बदलने की तैयारी तक शुरू कर दी थी. लेकिन एक हफ्ते बाद जो मंजर दिख रहा है, उसने पूरी दुनिया के सैन्य जानकारों को हैरान कर दिया है. ईरान न सिर्फ इस जंग में मजबूती से टिका हुआ है, बल्कि उसने अमेरिका और इजराइल जैसे ताकतवर देशों की नाक में दम कर रखा है.
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर 'ड्रोन' का कहर
हमले के महज चार-पांच दिनों के भीतर ही युद्ध का रुख पूरी तरह पलट गया. मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिका का शायद ही कोई ऐसा मिलिट्री अड्डा बचा हो, जो ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की जद में न आया हो. हैरानी की बात यह है कि इजराइल का वह मशहूर एयर डिफेंस सिस्टम, जिस पर उसे सबसे ज्यादा नाज था, वह भी ईरान के इन छोटे और सस्ते ड्रोंस को रोकने में नाकाम साबित हो रहा है. ईरान ने चुन-चुनकर यूएई, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत जैसे देशों में बने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है, जिन्हें तैयार करने में अमेरिका ने सालों की मेहनत और अरबों डॉलर लगाए थे.
तेल के खेल में ईरान की बड़ी चोट?
ईरान ने सिर्फ सैन्य ठिकानों पर ही हमला नहीं किया, बल्कि खाड़ी देशों की तेल रिफाइनरियों को भी निशाना बनाया है. इसका नतीजा यह हुआ है कि इतिहास में पहली बार मिडिल ईस्ट से होने वाला तेल का निर्यात लगभग पूरी तरह ठप हो गया है. इस आर्थिक चोट ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की कमर तोड़ दी है. सबसे ज्यादा चर्चा ईरान के उस 'शाहेद ड्रोन' की हो रही है, जिसे अब "गरीब देशों की क्रूज मिसाइल" कहा जाने लगा है. यह छोटा सा हथियार अमेरिका जैसे सुपरपावर के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है.
करोड़ों की मिसाइल बनाम चंद रुपयों का ड्रोन?
इस जंग में सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू इन हथियारों की कीमत का अंतर है. सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के एक 'शाहेद ड्रोन' को बनाने में 20,000 से 50,000 डॉलर (करीब 16 से 40 लाख रुपये) का खर्च आता है. वहीं, अमेरिका इन ड्रोंस को मार गिराने के लिए जिन इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है, उनके एक शॉट की कीमत 3 मिलियन से 12 मिलियन डॉलर (करीब 25 से 100 करोड़ रुपये) तक होती है. गणित सीधा है, जितने पैसे में अमेरिका एक मिसाइल दागता है, उतने में ईरान 150 से 600 घातक ड्रोन तैयार कर सकता है. अमेरिका जीत कर भी हार रहा है, क्योंकि इन ड्रोंस को मार गिराना उसकी जेब पर बहुत भारी पड़ रहा है.
शाहेद ड्रोन की ताकत कितनी ताकत?
ईरान का शाहेद ड्रोन दिखने में भले ही छोटा हो, लेकिन इसकी क्षमताएं किसी बड़े हथियार से कम नहीं हैं. यह जमीन से बहुत कम ऊंचाई पर उड़ता है, जिससे रडार की नजरों से बचना इसके लिए आसान हो जाता है. यह एक बार में 2500 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकता है और अपने साथ 15 से 50 किलो तक बारूद ले जा सकता है. 185 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाला यह आत्मघाती ड्रोन जब झुंड में हमला करता है, तो दुनिया का सबसे अच्छा एयर डिफेंस सिस्टम भी फेल हो जाता है. अगर कोई डिफेंस सिस्टम 90% ड्रोंस को गिरा भी दे, तब भी बचे हुए 10% ड्रोन टारगेट को तबाह करने के लिए काफी होते हैं.
मिसाइलों से ज्यादा खतरनाक क्यों हैं ये ड्रोंस?
ईरान के पास मिसाइल पावर की कमी नहीं है, लेकिन मिसाइलों के साथ एक बड़ी दिक्कत उनके भारी-भरकम लॉन्चर्स की है. इन लॉन्चर्स को अमेरिका और इजराइल आसानी से पहचान कर हमला कर सकते हैं. एक बार लॉन्चर तबाह हुआ तो मिसाइल किसी काम की नहीं रहती. इसके उलट, ड्रोंस को कहीं से भी लॉन्च किया जा सकता है. चाहे वह कोई छोटी नाव हो, चलता हुआ ट्रक हो, सड़क हो या फिर कोई खेत. साथ ही, मिसाइल बनाने के लिए बड़ी फैक्ट्रियों की जरूरत होती है जो दुश्मन की नजर में आ जाती हैं, जबकि ड्रोन का प्रोडक्शन किसी भी छोटी और छुपी हुई जगह पर किया जा सकता है.
अमेरिका के पास खत्म हो रहा है गोला-बारूद
युद्ध लंबा खींचने के साथ ही अमेरिका की एक और कमजोरी सामने आ गई है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका के पास इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी होने लगी है. हालात इतने खराब हैं कि अब अमेरिका को दक्षिण कोरिया में तैनात अपनी पैट्रियट मिसाइलों को मिडिल ईस्ट में भेजने की तैयारी करनी पड़ रही है. अमेरिकी जनरल डैन केन ने पहले ही ट्रंप को आगाह किया था कि अगर ईरान के साथ जंग लंबी चली, तो अमेरिका के पास बचाने के लिए पर्याप्त मिसाइलें नहीं बचेंगी. आज उनकी यह बात सच साबित होती दिख रही है.
लंबी जंग का मतलब अमेरिका के लिए बड़ी हार
इस पूरे हालात का निचोड़ यह है कि जंग जितनी लंबी खिंचेगी, अमेरिका को उतनी ही ज्यादा चोट पहुंचेगी. ईरान ने अपने सस्ते लेकिन असरदार ड्रोंस के जरिए युद्ध की पूरी परिभाषा ही बदल दी है. अमेरिका की अरबों डॉलर की तकनीक एक मामूली कीमत वाले ड्रोन के आगे बेबस नजर आ रही है. फिलहाल अमेरिका के पास ईरान के इस 'ड्रोन पावर' का कोई पुख्ता तोड़ नजर नहीं आ रहा है, जो इस जंग के भविष्य को ईरान के पक्ष में मोड़ सकता है.
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