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राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा और पीएम मोदी Photograph: (x/@narendramodi)
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा 18 से 22 फरवरी 2026 तक भारत के खास दौरे पर आ रहे हैं. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, वे भारत के निमंत्रण पर यहां आ रहे हैं और 19-20 फरवरी को होने वाले अंतरराष्ट्रीय AI समिट में भी शिरकत करेंगे. यह लूला की छठी भारत यात्रा है, जो दिखाती है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते कितने गहरे हो चुके हैं. पिछले साल पीएम मोदी भी ब्राजील गए थे, जो 57 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा था.
260 कंपनियों का दल
राष्ट्रपति लूला अकेले नहीं आ रहे, उनके साथ करीब 260 कंपनियों के मालिकों और अधिकारियों का एक बहुत बड़ा दल आ रहा है. 21 फरवरी को एक बड़ा 'बिजनेस फोरम' होगा. ब्राजील अब अमेरिका और चीन जैसे देशों पर अपनी निर्भरता कम करके भारत के साथ हाथ मिलाना चाहता है. ब्राजील की व्यापार एजेंसी (ApexBrasil) भारत में अपना ऑफिस भी खोलने वाली है, ताकि यहाँ के बाजार में वे लंबे समय तक टिक सकें.
इन 5 बड़े क्षेत्रों पर रहेगी सबकी नजर
भारत और ब्राजील के बीच फिलहाल 15 बिलियन डॉलर का व्यापार होता है, जिसे 2030 तक 20 बिलियन डॉलर (लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये) तक ले जाने का लक्ष्य है. इस दौरे में मुख्य रूप से इन क्षेत्रों में समझौते हो सकते हैं:
खेती और खाना: ब्राजील सोयाबीन और चीनी का बड़ा निर्यातक है, वहीं भारत नई खेती तकनीक चाहता है.
सस्ता ईंधन (Biofuel): ब्राजील एथेनॉल बनाने में दुनिया में दूसरे नंबर पर है. भारत भी पेट्रोल में एथेनॉल मिला रहा है, इसलिए इस क्षेत्र में बड़ी साझेदारी होगी.
सस्ती दवाएं (Pharma): भारत अपनी जेनेरिक दवाएं अब ब्राजील के बड़े बाजार में और ज्यादा भेजना चाहता है.
रक्षा और विमान: ब्राजील की कंपनी 'एम्ब्राएर' भारत के साथ मिलकर विमान और सैन्य साजो-सामान बनाने पर बात कर सकती है.
AI और तकनीक: राष्ट्रपति का AI समिट में आना यह बताता है कि अब दोनों देश मिलकर नई टेक्नोलॉजी के नियम तय करेंगे.
'ग्लोबल साउथ' की बुलंद आवाज
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति लूला, दोनों ही दुनिया के मंच पर विकासशील देशों (Global South) की आवाज मजबूत करना चाहते हैं. चाहे संयुक्त राष्ट्र (UN) में सुधार की बात हो या ब्रिक्स (BRICS) को ताकतवर बनाना, दोनों नेताओं की सोच एक जैसी है. लूला का यह दौरा न केवल भारत के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह दुनिया को यह संदेश भी देगा कि अब उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं किसी भी बड़ी शक्ति के आगे झुकने के बजाय अपने दम पर आगे बढ़ रही हैं.
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