एआई का समान लाभ सुनिश्चित करने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों को अपने स्वयं के एलएलएम बनाने चाहिए : अमिताभ कांत

एआई का समान लाभ सुनिश्चित करने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों को अपने स्वयं के एलएलएम बनाने चाहिए : अमिताभ कांत

एआई का समान लाभ सुनिश्चित करने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों को अपने स्वयं के एलएलएम बनाने चाहिए : अमिताभ कांत

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IANS
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New Delhi: Former CEO of the NITI Aayog and G20 Sherpa Amitabh Kant during a panel discussion on 'Solving the Energy Trilemma: Access, Affordability, Availability' the Raisina Dialogue 2024

(source : IANS) ( Photo Credit : IANS)

नई दिल्ली, 17 फरवरी (आईएएनएस)। नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने मंगलवार को कहा कि बड़ी कंपनियां ग्लोबल साउथ के देशों से प्राप्त डेटा का इस्तेमाल अपने लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) को प्रशिक्षित करने में कर रही हैं। ऐसे में एआई का समान लाभ सुनिश्चित करने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों को अपने स्वयं के डेटा के आधार पर अपने मॉडल बनाने चाहिए।

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राष्ट्रीय राजधानी में में चल रहे इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में एक पैनल चर्चा के दौरान बोलते हुए, कांत ने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों से प्राप्त डेटा का इस्तेमाल लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) को प्रशिक्षित करने में किया जा रहा है। भारत आज संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक डेटा प्रदान करता है।

कांत के अनुसार, ग्लोबल साउथ के डेटा के आधार पर एलएलएम में सुधार हो रहा है और उन्होंने चेतावनी दी कि बड़ी तकनीकी कंपनियां इस डेटा पर आधारित व्यावसायिक मॉडल बना सकती हैं और बाद में उत्पादों को उच्च लागत पर बेच सकती हैं। इस कारण भारत और अन्य विकासशील देशों को समान लाभ सुनिश्चित करने के लिए अपने स्वयं के डेटा के आधार पर अपने मॉडल बनाने चाहिए।

इसके अलावा नीति आयोग के पूर्व सीईओ ने कहा कि एआई किफायती, जवाब देह और आसान पहुंच वाला होना चाहिए। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को बहुभाषीय हो, जिससे इसका इस्तेमाल ग्लोबल साउथ के लोगों की जिंदगी में बदलाव के लिए किया जा सके, ताकि असमानता और गहरी नहीं हो।

कांत के मुताबिक, तेजी से एआई के विकास और बड़े निवेश के कारण अधिक असमान समाज के निर्माण की संभावना बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कि एआई के विकास में चुनौती यह है कि क्या हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी तक पहुंचे, क्या इसका उपयोग ग्लोबल साउथ के नागरिकों के जीवन को बदलने के लिए किया जा सकता है और क्या इसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य परिणामों और पोषण मानकों में सुधार के लिए किया जा सकता है।

कांत ने चेतावनी दी कि यदि एआई को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लाभ के लिए डिजाइन नहीं किया गया, तो मौजूदा असमानताएं और भी बढ़ सकती हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा और सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए इस तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए, और यह भी बताया कि जो पहले भौतिक रूप से संभव नहीं था, वह अब एआई के कारण संभव है।

--आईएएनएस

एबीएस/

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