पाकिस्तान में प्रेस आजाद नहीं, पत्रकारों के खिलाफ कानून का कर रहा बेजा इस्तेमाल: आईएफजे

पाकिस्तान में प्रेस आजाद नहीं, पत्रकारों के खिलाफ कानून का कर रहा बेजा इस्तेमाल: आईएफजे

पाकिस्तान में प्रेस आजाद नहीं, पत्रकारों के खिलाफ कानून का कर रहा बेजा इस्तेमाल: आईएफजे

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IANS
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Pakistani Journalist

(source : IANS) ( Photo Credit : IANS)

इस्लामाबाद, 14 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान में प्रेस की आजादी खतरे में है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (आईएफजे) और उससे जुड़े पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (पीएफयूजे) ने डिजिटल पत्रकार और यूट्यूब होस्ट सोहराब बरकत को लंबे समय तक हिरासत में रखने के लिए कानून के बेजा इस्तेमाल की निंदा करते हुए उनकी तुरंत रिहाई के लिए आवाज उठाई है।

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पाकिस्तानी न्यूज आउटलेट सियासत के पत्रकार और इस्लामाबाद में रहने वाले 31 साल के बरकत को पिछले साल 26 नवंबर को यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस में जाते समय इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया था।

फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) द्वारा गिरफ्तारी के बाद, उन्हें लाहौर में नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनसीसीआईए) में ट्रांसफर कर दिया गया और तब से वे प्री-ट्रायल हिरासत में हैं।

18 जनवरी को, सियासत ने बरकत की लगातार हिरासत से बढ़े हुए दबाव और ऑपरेशनल मुश्किलों का हवाला देते हुए अपने इस्लामाबाद ऑफिस को बंद करने का ऐलान कर दिया।

आईएफजे की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, बार-बार हो रही एफआईआर, खासकर जब पत्रकार हिरासत में है, तो यह सही प्रक्रिया को दरकिनार करने और मीडिया के खिलाफ कानूनी सिस्टम को हथियार बनाने की एक स्पष्ट कोशिश है। न्यायिक उत्पीड़न का यह तरीका न सिर्फ समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, बल्कि पूरे पाकिस्तान में स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर पड़ने वाले डरावने असर को भी दिखाता है। आईएफजे पाकिस्तानी अधिकारियों से सोहराब बरकत को तुरंत रिहा करने और क्रिटिकल रिपोर्टिंग को चुप कराने के लिए क्रिमिनल लॉ का गलत इस्तेमाल बंद करने की अपील करता है।

पत्रकार पर प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पीईसीए) के तहत तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं। पहली 5 अगस्त, 2025 को दर्ज हुई थी; उसमें बरकत पर सरकारी संस्थाओं के बारे में ‘सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली बातें’ और गलत जानकारी फैलाने का आरोप है। ये आरोप कथित तौर पर एक विपक्षी एक्टिविस्ट के साथ उनके इंटरव्यू से जुड़ा है।

दूसरी 26 अगस्त, 2024 को दर्ज हुई थी; उसमें ‘हेट स्पीच’, ‘मानहानि’ और ‘साइबर हैरेसमेंट’ के आरोप शामिल हैं।

तीसरी 5 दिसंबर, 2025 को दर्ज की गई थी, जब बरकत पहले से ही कस्टडी में थे। इसमें ‘साइबर टेररिज्म’ और ‘गलत जानकारी’ फैलाने के आरोप शामिल हैं। यह आरोप कथित तौर पर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में विरोध प्रदर्शनों की सोशल मीडिया कवरेज और बलूचिस्तान की जानी-मानी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट महरंग बलूच के नोबेल शांति पुरस्कार नॉमिनेशन से जुड़ा है।

आईएफजे के मुताबिक, दिसंबर 2025 में कोर्ट ने बरकत को दो मामलों में जमानत दे दी थी, लेकिन लाहौर हाई कोर्ट ने 21 जनवरी को उसकी तीसरी जमानत अर्जी खारिज कर दी। प्रॉसिक्यूशन ने उसे भगोड़ा करार दिया था।

पत्रकार की लीगल टीम का कहना है कि बरकत को उसकी गिरफ्तारी से पहले शुरुआती शिकायतों के बारे में कभी नहीं बताया गया था। हाल ही में, 3 फरवरी को, एनसीसीआईए ने एक संबंधित मामले में पत्रकार को पहले दी गई जमानत को चुनौती देने और रद्द करने के लिए कदम उठाया।

पाकिस्तान फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (पीएफयूजे) ने कहा, पत्रकारों को गलत तरीके से गिरफ्तार करना प्रेस की आजादी पर रोक लगाने जैसा है और यह किसी भी तरह से मंजूर नहीं है। सरकार को पत्रकार को तुरंत रिहा करना चाहिए।

इससे पहले, पाकिस्तान की ह्यूमन राइट्स काउंसिल (एचआरसी) ने बरकत की मनमाने ढंग से हिरासत, उनको जबरदस्ती गायब करने के पैंतरे और न्यायिक उत्पीड़न पर गंभीर चिंता जताई थी, और चेतावनी दी थी कि यह मामला देश में प्रेस की आजादी, सही प्रक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मामले में परेशानी का सबब बनता है।

पाकिस्तान के एचआरसी के अनुसार, बरकत को हिरासत में लेने के बाद गैर-कानूनी तरीके से लाहौर ट्रांसफर कर दिया गया था, और बाद में उन्हें कई मामलों में फंसा दिया गया, जबकि इस्लामाबाद हाई कोर्ट में यह कहा गया था कि उनके खिलाफ कोई जांच या मामला पेंडिंग नहीं है और वह यात्रा करने के लिए आजाद है।

पिछले साल दिसंबर में कहा गया, कोर्ट के फैसले और बाद की कार्रवाइयों के बीच विरोधाभास साफ दिखता है। ये कानून की अनदेखी दर्शाता है।

मानवाधिकार संस्था ने कहा था, कानूनी प्रक्रिया के अहम स्टेज पर एक के बाद एक मामलों का सामने आना बेल में रुकावट डालने और हिरासत को लंबा खींचने के मकसद से लगता है, जिससे कानूनी तरीकों के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

--आईएएनएस

केआर/

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