बांग्लादेश: चटगांव विश्वविद्यालय में छात्रों का दबदबा, शिक्षक पर हमले से आक्रोश

बांग्लादेश: चटगांव विश्वविद्यालय में छात्रों का दबदबा, शिक्षक पर हमले से आक्रोश

बांग्लादेश: चटगांव विश्वविद्यालय में छात्रों का दबदबा, शिक्षक पर हमले से आक्रोश

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IANS
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B’desh: Students rule Chittagong University as teacher assault sparks outrage (Photo: @AijadM91655/X)

(source : IANS) ( Photo Credit : IANS)

चटगांव, 12 जनवरी (आईएएनएस)। चटगांव विश्वविद्यालय में एक सहायक प्रोफेसर पर छात्रों के एक समूह द्वारा किए गए हिंसक हमले ने पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया और निंदा को जन्म दिया है। सहायक प्रोफेसर हसन मुहम्मद रोमन शुवो पर यह हमला चटगांव विश्वविद्यालय केंद्रीय छात्र संघ के कार्यालय सचिव अब्दुल्ला अल नोमान के नेतृत्व में किया गया।

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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो फुटेज में देखा जा सकता है कि नोमान और उसके साथी शिक्षक को गर्दन से पकड़कर घसीटते हुए प्रॉक्टर कार्यालय में ले जाते हैं।

‘द डेली स्टार’ की रिपोर्ट के अनुसार यह घटना कोई अचानक हुई झड़प नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से की गई सोची-समझी हिंसा थी, जिसने परिसर के प्रशासन और छात्र नेतृत्व की नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि एक निर्वाचित छात्र नेता होने के बावजूद अब्दुल्ला अल नोमान ने व्यवस्था बनाए रखने के बजाय खुद हिंसा का नेतृत्व किया।

स्पष्ट वीडियो साक्ष्य के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। आलोचकों का कहना है कि प्रशासन की यह चुप्पी पूरी तरह से अस्वीकार्य है। नोमान का यह दावा कि उन्होंने “रक्षा के लिए” कदम उठाया क्योंकि “कुछ छात्र शिक्षक को पीटना चाहते थे”, को भी खोखला और भ्रामक बताया जा रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे बयान वास्तव में एक भीड़ की मौजूदगी की पुष्टि करते हैं, जिसके आगे नोमान स्वयं खड़ा था। उनका यह कहना कि शिक्षक के साथ “कोई उत्पीड़न नहीं हुआ”, आम समझ का अपमान मानते हुए व्यापक तौर पर मजाक का विषय बन गया है।

विश्वविद्यालयों का उद्देश्य न्यायसंगत प्रक्रिया का पालन करना होता है, न कि भीड़तंत्र को बढ़ावा देना। प्रॉक्टर पहले ही पुष्टि कर चुके हैं कि प्रोफेसर शुवो के खिलाफ कई जांच चल रही हैं, लेकिन किसी भी स्थिति में शारीरिक हमला सही नहीं ठहराया जा सकता।

अखबार ने लिखा कि कानून को अपने हाथ में लेना पूरी तरह अराजकता है, खासकर एक शैक्षणिक संस्थान में।

अब विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने कई असहज सवाल खड़े हैं—प्रवेश परीक्षाओं के दौरान दिनदहाड़े यह हिंसा कैसे हुई? शिक्षक को सुरक्षा क्यों नहीं मिली? और इतने स्पष्ट वीडियो सबूतों के बावजूद अब्दुल्ला अल नोमान के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

प्रशासन की निष्क्रियता से परिसर राजनीति में हिंसा को सामान्य बनाने का खतरा पैदा हो गया है। यह घटना शिक्षकों, छात्रों और नए दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के लिए एक डरावना संदेश देती है कि यहां सुरक्षा सिद्धांतों से नहीं, बल्कि ताकत से तय होती है और निर्वाचित पद अपराधियों के लिए ढाल बन सकते हैं।

जुलाई आंदोलन का हवाला देकर हमले को सही ठहराने की कोशिश को भी इतिहास का विकृत उपयोग बताते हुए कड़ी निंदा की गई है। यह उस आंदोलन के मूल्यों के साथ विश्वासघात है, जो उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष पर आधारित था।

अखबार ने कहा कि अब तत्काल और सख्त कार्रवाई की जरूरत है। यदि छात्र नेताओं के नेतृत्व में हुई हिंसा को दंडित नहीं किया गया, तो विश्वविद्यालय सीखने के केंद्र के बजाय डर के अखाड़े बन जाएंगे। चटगांव विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया ही यह तय करेगी कि वह न्याय के पक्ष में खड़ा होता है या चुपचाप भीड़तंत्र के आगे समर्पण कर देता है।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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