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Malaria Anopheles Mosquitoes
भारत ने 2030 तक मलेरिया को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य रखा है. लेकिन इस राह में अब एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है. दिक्कत ये है कि मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों ने अपना व्यवहार बदल लिया है और इससे भी बड़ी दिक्कत ये है कि कई जगह तो मच्छरों पर कीटनाशक दवाईयों का असर ही नहीं हो रही है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के नेशनल मलेरिया इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च, गोवा की ताजा स्टडी में ये दावा किया गया है.
इस अध्ययन को देश के आठ राज्यों के 14 जिलों में किया गया है. इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक अजीत कुमार मोहंती के नेतृत्व में रिसर्च किया गया. वैज्ञानिकों ने मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों की प्रजातियां, उनकी संख्या, घर के अंदर और घर के बाहर रहने का व्यवहार, कीटनाशकों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया और इंसानों को काटने की आदत के प्रति उनकी प्रतिक्रिया का विस्तार से अध्ययन किया.
स्टडी में क्या सामने आया
स्टडी में सामने आया कि भारत में मलेरिया का सबसे प्रमुख मच्छर एनोफिलीज माना जाता है, जो स्टडी में शामिल सभी राज्यों में मौजूद था. छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में ये मच्छर घरों में सबसे अधिक पाए गए. वहीं, उत्तर प्रदेश के बरेली में ये मच्छर घरों के बाहर सबसे ज्यादा पाए गए. मच्छर अब पारंपरिक व्यवहार से हटकर अलग-अलग जगह एक्टिव दिख रहे हैं.
पूर्वोत्तर राज्यों में भी मच्छरों के व्यवहार में बदलाव दिख रहे हैं. असम और त्रिपुरा में मच्छर की कुछ प्रजातियां पहले की तुलना में आराम करते और एक्टिव पाए गए. कुछ इलाकों में मच्छर ज्यादा इंसानों को काटते दिख रहे हैं, जिससे मलेरिया फैलने का खतरा बढ़ जाता है.
बदलनी होगी रणनीति
चौंकाने वाली बात ये है कि कई जिलों में मलेरिया के मच्छरों ने आम कीटनाशनक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध हासिल कर लिया है. इसका मतलब ये है कि मच्छर मारने के लिए जिन दवाओं का स्प्रे किया जाता है, वह अब उतने असरदार नहीं रहे. विशेषज्ञों का कहना है कि मच्छरों के प्रतिरोध को ध्यान में रखकर अगर रणनीति नहीं बदली जाती है तो मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं है.
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