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Explainer: चांदी एक ऐसी धातु जो प्राचीन काल से लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है. बर्तनों से लेकर गहनों तक और उद्योगों में इसका भरपूर इस्तेमाल होता है. लेकिन बीते कुछ वक्त में चांदी की कीमतों में जो तेजी देखी गई है उसने हर किसी को चौंका दिया है. मौजूदा वक्त में चांदी का रेट एमसीएक्स पर 3 लाख 18 हजार रुपए के पार हो गया है.
सोने की चमक तो हमेशा से सुर्ख़ियों में रहती है, लेकिन साल 2026 की शुरुआत में 'चांदी' (Silver) ने निवेशकों और आम जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा है. चांदी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर को छू रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अचानक चांदी इतनी महंगी क्यों हो रही है और भारत अपनी चांदी की ज़रूरतें कहां से पूरी करता है?
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चांदी के भाव बढ़ने के 4 मुख्य कारण
चांदी की कीमतों में उछाल केवल आभूषणों की मांग की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और तकनीकी कारण हैं...
1. औद्योगिक मांग: चांदी सिर्फ एक गहना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण औद्योगिक धातु है. सौर ऊर्जा (Solar Panels) और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के निर्माण में चांदी का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है. जैसे-जैसे दुनिया 'ग्रीन एनर्जी' की ओर बढ़ रही है, चांदी की खपत बढ़ती जा रही है.
2. सुरक्षित निवेश: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव (जैसे पश्चिम एशिया में संघर्ष) के समय निवेशक शेयर बाजार के बजाय सोने-चांदी को सुरक्षित मानते हैं. जब डॉलर कमजोर होता है या वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, तो चांदी के भाव तेजी से ऊपर जाते हैं.
3. आपूर्ति में कमी: दुनिया भर में चांदी का खनन (Mining) उसकी खपत की तुलना में धीमा है. पिछले कुछ वर्षों से चांदी के उत्पादन में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है, जबकि मांग हर साल 10-15% की दर से बढ़ रही है.
4. सेंट्रल बैंकों की खरीद: दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए कीमती धातुओं की खरीद बढ़ा रहे हैं, जिसका सीधा असर कीमतों पर दिख रहा है.
भारत में कहां से आती है चांदी?
भारत दुनिया में चांदी का सबसे बड़ा उपभोक्ता और आयातक है. भारत की चांदी की जरूरतें मुख्य रूप से दो तरीकों से पूरी होती हैं:
1. घरेलू उत्पादन
भारत में चांदी का उत्पादन बहुत सीमित है. भारत की लगभग 90 फीसदी से ज्यादा घरेलू चांदी 'हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड' (HZL) की ओर से उत्पादित की जाती है. राजस्थान की जावर और सिंदेसर खुर्द खदानें चांदी के उत्पादन के मुख्य केंद्र हैं. इसके अलावा झारखंड के जमशेदपुर की माइनिंग बेल्ट में भी थोड़ा उत्पादन होता है. वहीं दक्षिण में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में सोना के अलावा तांबे खनन के दौरान चांदी भी मिलती है. लेकिन कम मात्रा में.
2. अंतरराष्ट्रीय आयात
चूंकि घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, इसलिए भारत भारी मात्रा में चांदी आयात करता है. भारत मुख्य रूप से इन देशों से चांदी मंगाता है...
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE): 'सेपा' (CEPA) समझौते के बाद यूएई से आयात काफी बढ़ा है.
- यूनाइटेड किंगडम (UK) और हांगकांग: ये वैश्विक चांदी व्यापार के बड़े हब हैं.
- चीन और रूस: यहां से भी औद्योगिक ग्रेड की चांदी भारत आती है.
क्या और बढ़ेगी कीमत? या 1 लाख रुपए तक आ सकती है गिरावट
जानकारों की मानें तो चांदी की कीमतों का अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य 100 डॉलर है जबकि भारत के वायदा बाजार के टारगेट की बात करें तो ये 3.25 लाख रुपए है. ऐसे में ये टारगेट लगभग करीब है. 3.18 लाख तक रेट पहुंच चुके हैं. अगर दोनों जगहों पर चांदी टारगेट लेवल पर पहुंचती हैं तो कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है. 1980 में भी ऐसा ही हुआ था और चांदी में बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी. अगर यही रुख रहा तो इतिहास खुद को दोहराएगा और चांदी की कीमतों में 1 लाख रुपए तक की गिरावट संभव है.
बहरहाल चांदी अब केवल 'गरीबों का सोना' नहीं रह गई है, बल्कि यह भविष्य की 'इंडस्ट्रियल करेंसी' बनती जा रही है. यदि आप निवेश की सोच रहे हैं, तो चांदी एक लंबी अवधि के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती है, लेकिन बाजार जोखिमों को समझना भी जरूरी है.
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