Explainer: डॉलर के मुकाबले 91.73 के 'ऑल टाइम लो' पर फिसला रुपया, आखिर क्यों टूट रहा है ऐसे?

बुधवार को रुपया 76 पैसे गिरकर डॉलर के मुकाबले 91.73 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ. विदेशी फंड निकासी, वैश्विक जोखिम भावना और भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों की धारणा कमजोर की. घरेलू शेयर बाजारों में गिरावट ने भी दबाव बढ़ाया.

बुधवार को रुपया 76 पैसे गिरकर डॉलर के मुकाबले 91.73 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ. विदेशी फंड निकासी, वैश्विक जोखिम भावना और भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों की धारणा कमजोर की. घरेलू शेयर बाजारों में गिरावट ने भी दबाव बढ़ाया.

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Ravi Prashant
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इंडियन रुपी Photograph: (Grok AI)

भारतीय करेंसी रुपये के लिए बुधवार का दिन काफी बुरा साबित हुआ. डॉलर के मुकाबले रुपया आज अपने अब तक के सबसे लो लेवल पर पहुंच गया. बाजार बंद होने तक रुपया 76 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ 91.73 के स्तर पर आ गया. यह पहली बार है जब रुपया इतना नीचे गिरा है, जिसे 'ऑल टाइम लो' कहा जा रहा है. इससे पहले दिसंबर 2025 में भी रुपये में गिरावट आई थी, लेकिन ताजा आंकड़ों ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अगर हम सिर्फ इसी महीने की बात करें, तो रुपये की वैल्यू में लगभग 1.50 परसेंट की कमी आ गई है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के नजरिए से थोड़ी चिंता वाली बात है.

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निवेशक भी हो गए हैरान

आज सुबह जब फॉरेक्स मार्केट खुला, तो रुपया 91.05 के आसपास था, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता गया, इस पर दबाव बढ़ता गया और एक समय तो यह 91.74 तक फिसल गया था. पिछले कल भी इसमें थोड़ी कमजोरी देखी गई थी, लेकिन आज की गिरावट ने निवेशकों को हैरान कर दिया है. 

आखिर क्यों कमजोर हो रहा है रुपये? 

आखिर रुपया इतना कमजोर क्यों हो रहा है? इसके पीछे कई बड़े ग्लोबल कारण हैं. जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में जो उथल-पुथल मची है, उसका सीधा असर हमारी करेंसी पर पड़ रहा है. सबसे बड़ी वजह है विदेशी इन्वेस्टर्स का भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालना. जब बाहर के बड़े निवेशक भारत के शेयर बाजार से अपना पैसा निकालकर वापस ले जाते हैं, तो रुपये की डिमांड कम हो जाती है और डॉलर मजबूत होने लगता है. 

ग्रीनलैंड में चल रहा है विवाद भी है कारण

इसके अलावा, यूरोप में ग्रीनलैंड को लेकर जो विवाद चल रहा है, उसने पूरी दुनिया के मार्केट में डर का माहौल बना दिया है. लोग अपना पैसा सुरक्षित जगहों पर लगाना चाहते हैं, जिसकी वजह से डॉलर जैसी करेंसी की मांग बढ़ गई है. अमेरिका और यूरोप के बीच बिगड़ते रिश्तों और नाटो (NATO) संगठन को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने भी आग में घी डालने का काम किया है.

दूसरी दुनिया की इकोनॉमी पर भी असर

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया की दूसरी उभरती हुई इकोनॉमी भी इस वक्त मुश्किल दौर से गुजर रही हैं. ग्रीनलैंड विवाद और वेनेजुएला के तेल को लेकर अमेरिका की जो भूमिका है, उसने ग्लोबल ट्रेड यानी वैश्विक व्यापार को काफी हद तक प्रभावित किया है. इन सब वजहों से मार्केट में पैसा टिक नहीं पा रहा है. हालांकि, एक्सपर्ट्स यह भी कह रहे हैं कि अगर भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटका हुआ ट्रेड एग्रीमेंट (व्यापार समझौता) फाइनल हो जाता है, तो रुपये को काफी सहारा मिल सकता है. यह समझौता मार्केट में स्टेबिलिटी ला सकता है.

क्या RBI देगा दखल? 

राहत की बात यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास विदेशी मुद्रा का अच्छा-खासा भंडार है. ऐसे में अगर रुपया और ज्यादा गिरता है, तो RBI दखल देकर स्थिति को कंट्रोल कर सकता है. दूसरी तरफ, कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी कमी आई है, जो भारत के लिए अच्छी खबर हो सकती है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से खरीदता है. लेकिन जब तक ग्लोबल लेवल पर चल रहे तनाव कम नहीं होते, तब तक रुपये पर यह दबाव बना रह सकता है. शेयर बाजार में भी आज काफी सुस्ती रही और सेंसेक्स-निफ्टी दोनों गिरकर बंद हुए, जिसका सीधा कनेक्शन रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से जुड़ा है.

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