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(source : IANS) ( Photo Credit : IANS)
नई दिल्ली, 23 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में राजनीति से महिलाओं की भागीदारी लगातार गायब होती जा रही है। बांग्लादेश के सियासी इतिहास के पन्नों पर दो ऐसे नाम दर्ज हैं, जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी है। बांग्लादेश की सियासत का इतिहास खालिदा जिया और शेख हसीना के नाम के बिना अधूरा है। बावजूद इसके, आज यहां पर महिलाओं की भागीदारी गिरती जा रही है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या नहीं के बराबर है।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें सशक्त करने के वादे दशकों से किए जा रहे हैं, लेकिन फिर भी आगामी चुनाव में उनकी भूमिका की बिल्कुल अलग तस्वीर दिख रही है।
बांग्लादेशी मीडिया यूएनबी ने बताया कि जमात-ए-इस्लामी समेत 30 से ज्यादा पंजीकृत राजनीतिक दलों ने कोई भी महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में नहीं उतारा है। 13वें संसदीय चुनाव में सभी उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या 4.5 से भी कम रह गई। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है।
चुनाव के लिए जमा किए गए 2,568 नामांकन में सिर्फ 109 महिलाओं ने अपना नॉमिनेशन दाखिल किया है। बांग्लादेशी मीडिया के रिव्यू किए गए डेटा के मुताबिक, 2,568 नामांकन में महिलाओं की संख्या सिर्फ 4.24 प्रतिशत है।
हाल ही में इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने बताया कि आने वाले आम चुनाव में हिस्सा ले रही 51 राजनीतिक दलों में से 30 ने एक भी महिला उम्मीदवार को प्रतिनिधि नहीं बनाया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि बांग्लादेश की एक बड़ी पार्टी, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, उन सीटों पर कोई महिला उम्मीदवार नहीं उतारा।
स्क्रूटनी के दौरान, कई महिला उम्मीदवारों ने अपनी उम्मीदवारी खो दी। 37 निर्दलीय महिला उम्मीदवारों में से, सिर्फ छह के नॉमिनेशन वैद्य घोषित किए गए। जिन सीटों पर महिला उम्मीदवारों का नॉमिनेशन वैद्य बताया गया है, उनमें सबीना यास्मीन (नटोरे-2), डॉ. तस्नीम जारा (ढाका-9), मेहरजान आरा तालुकदार (जमालपुर-4), अख्तर सुल्ताना (मैमनसिंह-6), तहमीना जमान (नेत्रकोना-4), और रूमीन फरहाना (ब्राह्मणबरिया-2) शामिल हैं।
जमात-ए-इस्लामी से 276 उम्मीदवार, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश से 268, जातीय पार्टी से 224, गण अधिकार परिषद से 104, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस से 94, और दूसरी छोटी पार्टियों में, जिनमें से हर एक में 40 से कम उम्मीदवार हैं, लेकिन इनमें कोई महिला उम्मीदवार नहीं है।
फोरम लीडर समीना यास्मीन ने इस संबंध में कहा, “अगर महिलाएं 51 फीसदी वोटर हैं, तो हमारा अगला जरूरी काम महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना, उन्हें ऑर्गनाइज करना और उनकी सक्रिय राजनीतिक हिस्सेदारी पक्का करना है। क्या 51 फीसदी आबादी को बाहर करके और बाकी 49 फीसदी पर भरोसा करके सत्ता में आना सही है? यह एक जरूरी सवाल है।”
महिलाओं, मानवाधिकार और विकास के मुद्दों पर काम करने वाले 71 संगठनों के एक प्लेटफॉर्म, सोशल रेजिस्टेंस कमेटी, ने आने वाले चुनाव में महिला उम्मीदवारों की कम संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि समाज में मौजूद औरतों से नफरत करने वाली संस्कृति को देखते हुए, महिलाएं निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने में हिचकिचा रही हैं।
महिलाओं की सियासत में भागीदारी कम होने की वजह वहां पर पुरुष-प्रधान राजनीतिक कल्चर की झलक और पुरुषों के दबदबे वाली राजनीति, पुरुष-प्रधान समाज वाली विचारधारा को बनाए रखने की नीति है।
--आईएएनएस
केके/एबीएम
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