वुडरो विल्सन के 'पीस विदआउट विक्ट्री' ने दिखाई दुनिया को नई राह, 14 प्वाइंट बने राष्ट्र संघ का आधार

वुडरो विल्सन के 'पीस विदआउट विक्ट्री' ने दिखाई दुनिया को नई राह, 14 प्वाइंट बने राष्ट्र संघ का आधार

वुडरो विल्सन के 'पीस विदआउट विक्ट्री' ने दिखाई दुनिया को नई राह, 14 प्वाइंट बने राष्ट्र संघ का आधार

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IANS
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Woodrow Wilson

(source : IANS) ( Photo Credit : IANS)

नई दिल्ली, 21 जनवरी (आईएएनएस)। आज जब आधी दुनिया में जंग के हालात हैं तो अमेरिका के ही एक ऐसे राष्ट्रपति को याद करना जरूरी है जिसने दुनिया को शांति की राह दिखाई। राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने अमेरिकी सीनेट में एक ऐतिहासिक भाषण दिया था जिसे इतिहास में “पीस विदआउट विक्ट्री” के नाम से जाना जाता है। भाषण ऐसे समय में आया था जब प्रथम विश्व युद्ध अपने सबसे भयावह दौर में था और यूरोप के अधिकांश देश युद्ध की विभीषिका झेल रहे थे। विल्सन का मानना था कि यदि युद्ध का अंत किसी एक पक्ष की पूर्ण जीत और दूसरे की अपमानजनक हार से हुआ, तो वह शांति स्थायी नहीं होगी।

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22 जनवरी 1917 को दिए अपने भाषण में वुडरो विल्सन ने तर्क दिया कि विजय पर आधारित शांति बदले की भावना को जन्म देती है, जो भविष्य में नए संघर्षों को आमंत्रण देती है। उन्होंने कहा कि सच्ची और टिकाऊ शांति वही होगी जिसमें किसी देश को पराजित और अपमानित न किया जाए, बल्कि सभी देशों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित हो। यह विचार उस दौर की पारंपरिक “विजेता बनाम पराजित” राजनीति से बिल्कुल अलग था।

इतिहासकार आर्थर एस. लिंक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक वुडरो विल्सन एंड द प्रोग्रेसिव एरा” में लिखते हैं कि विल्सन का यह विचार उनके नैतिक आदर्शवाद और नैतिकता से गहराई से जुड़ा था। लिंक के अनुसार, विल्सन अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल शक्ति-संतुलन के नजरिए से नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी के रूप में देखते थे।

हालाकि, उस समय यूरोपीय शक्तियों ने विल्सन के “पीस विदआउट विक्ट्री” के सिद्धांत को व्यावहारिक नहीं माना। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश जर्मनी की स्पष्ट हार चाहते थे। इसके बावजूद, विल्सन का यह विचार आगे चलकर उनके ‘फोर्टीन पॉइंट्स’ का आधार बना, जिसे उन्होंने 1918 में प्रस्तुत किया। इन बिंदुओं में आत्मनिर्णय, खुले कूटनीतिक समझौते और राष्ट्र संघ की स्थापना जैसे विचार शामिल थे।

“पीस विदआउट विक्ट्री” केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि यह विश्व राजनीति को नैतिक आधार देने का एक प्रयास था। भले ही तत्कालीन विश्व शक्तियां इसे पूरी तरह स्वीकार न कर सकीं, लेकिन इस विचार ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्थायी शांति बल से नहीं, बल्कि न्याय, सहयोग और पारस्परिक सम्मान से ही संभव है।

--आईएएनएस

केआर/

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